पंजाब विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित कर इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) द्वारा वोटर लिस्ट रिविजन में हुई कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच की मांग की है। राज्य सरकार ने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने का आरोप लगाया है, जिससे संवैधानिक संस्थाओं के साथ राजनीतिक तनाव बढ़ गया है।
पंजाब विधानसभा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) के कामकाज की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए एक सरकारी प्रस्ताव पास किया है। यह कदम 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) के दौरान लाखों पात्र मतदाताओं के नाम मनमाने ढंग से हटाए जाने के आरोपों के बाद उठाया गया है।
मुख्यमंत्री का गंभीर आरोप
विधानसभा सत्र के दौरान मुख्यमंत्री भगवंत मान ने तर्क दिया कि चुनावी रोल रिविजन की प्रक्रिया का इस्तेमाल वोटर लिस्ट में हेरफेर करने के लिए किया जा रहा है। राज्य सरकार का दावा है कि विपक्षी झुकाव वाले मतदाताओं को सुनियोजित तरीके से लिस्ट से बाहर किया गया है, जबकि बिहार, पश्चिम बंगाल, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अन्य नामों को जोड़ा गया। वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने प्रस्ताव पेश करते हुए इसे नागरिकों के संवैधानिक वोटिंग अधिकारों का उल्लंघन बताया।
विधानसभा में क्या हुआ?
यह प्रस्ताव वॉयस वोट के जरिए पारित किया गया। गौरतलब है कि इस दौरान कांग्रेस, अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के विधायक सदन में मौजूद नहीं थे। प्रस्ताव में केवल जांच ही नहीं, बल्कि कथित संवैधानिक उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का सुझाव भी दिया गया है।
निवेशकों के लिए संकेत
निवेशकों और मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए, संवैधानिक और नियामक संस्थाओं से जुड़े ऐसे मामले महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि ये देश की दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता से जुड़े हैं। स्वतंत्र संस्थाएं बाजार के भरोसे का मुख्य स्तंभ मानी जाती हैं। हालांकि यह एक राजनीतिक विवाद है, लेकिन केंद्र और राज्य के बीच का यह प्रशासनिक अनिश्चितता का माहौल मार्केट पर असर डाल सकता है। बाजार के जानकारों की नजर अब इस पर टिकी है कि क्या यह प्रस्ताव किसी बड़े न्यायिक हस्तक्षेप या राष्ट्रीय चर्चा का रूप लेगा, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया में कोई भी बड़ा बदलाव राजनीतिक सेंटीमेंट को प्रभावित कर सकता है।
