तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के 25 गांवों के मछुआरे अब दशकों पुराने समुद्री सीमा विवाद को सुलझाने के लिए फिजिकल मार्कर की जगह GPS ट्रैकिंग का इस्तेमाल करेंगे। इस डिजिटल बदलाव के साथ ही रायादोरुवु (Rayadoruvu) सी-माउथ पर **₹133.11 करोड़** के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई है।
पुलीकट झील (Pulicat Lake) पर एक बड़ा प्रशासनिक और तकनीकी बदलाव होने जा रहा है, जिससे तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के मछुआरों के बीच दशकों से चला आ रहा सीमा विवाद अब डिजिटल तरीके से सुलझाया जाएगा। 25 मछली पकड़ने वाली बस्तियों के प्रतिनिधियों ने अब पुराने और अस्थाई मार्करों, जो अक्सर ताड़ के तनों से बनाए जाते थे, की जगह एक नई GPS-आधारित ट्रैकिंग प्रणाली अपनाने का फैसला किया है। यह कदम समुद्री सीमाओं को आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव है।
₹133.11 करोड़ का मास्टर प्लान
इस पहल को रायादोरुवु (Rayadoruvu) सी-माउथ पर शुरू होने वाले ₹133.11 करोड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का समर्थन प्राप्त है। यह प्रोजेक्ट सिल्टेशन (Siltation) यानी गाद जमा होने की पुरानी समस्या को खत्म करने के लिए डिजाइन किया गया है, जो इन दोनों राज्यों के बीच विवाद की मुख्य जड़ रही है। जब गाद जमा हो जाती है, तो नौकायन के लिए जगह कम हो जाती है, जिससे दोनों राज्यों की नावें एक ही सीमित दायरे में आ जाती हैं और टकराव बढ़ जाता है।
कानूनी मजबूती और डिजिटल घेराबंदी
इस नई योजना के तहत, मछली पकड़ने वाली सभी छोटी और बड़ी नावों पर ऑटोमेटेड GPS ट्रांसपोंडर लगाए जाएंगे। नेशनल सेंटर फॉर कोस्टल रिसर्च (National Centre for Coastal Research) को समुद्री सीमाओं के सटीक डिजिटल कोऑर्डिनेट्स तय करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा, तमिलनाडु मरीन फिशरीज रेगुलेशन एक्ट (Tamil Nadu Marine Fisheries Regulation Act) में संशोधन की तैयारी है, ताकि ट्रांसपोंडर के साथ छेड़छाड़ को कानूनी अपराध माना जाए।
कानूनी अड़चनें अभी भी बरकरार
हालांकि टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारी पूरी है, लेकिन क्षेत्र को अभी भी 2014 के हिंसक झड़प से जुड़े 199 लंबित पुलिस केसों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय प्रशासन और समुदाय के नेताओं का मानना है कि लंबे समय तक शांति के लिए इन पुराने मुकदमों का समाधान निकालना और डिजिटल सिस्टम की सफलता बहुत जरूरी होगी।
