कांग्रेस नेता राहुल गांधी राष्ट्रीय परीक्षा अनियमितताओं पर मुखर रहे हैं, लेकिन झारखंड में चल रहे JPSC और JSSC छात्र विरोध पर उनकी चुप्पी को लेकर आलोचना हो रही है। यह कथित चयनात्मक सक्रियता जांच के दायरे में है, क्योंकि उनकी पार्टी राज्य सरकार में गठबंधन सहयोगी है, जिससे शासन में निरंतरता पर सवाल उठ रहे हैं।
रांची में छात्र प्रदर्शन बना राजनीतिक मुद्दा
झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) परीक्षाओं को लेकर रांची में चल रहे छात्र विरोध प्रदर्शन एक बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभर रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी, जो राष्ट्रीय स्तर पर NEET-UG जैसी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों के बीच सक्रियता दिखा रहे हैं, उनकी झारखंड की स्थिति पर "चुप्पी" की आलोचना हो रही है। राजनीतिक विरोधी और प्रदर्शन कर रहे छात्र, दोनों ही उनके इस रुख पर सवाल उठा रहे हैं।
आलोचना का मुख्य बिंदु: राजनीतिक स्थिरता
आलोचकों, जिनमें भाजपा भी शामिल है, ने राहुल गांधी पर "चयनात्मक सक्रियता" का आरोप लगाया है। यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि कांग्रेस पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के नेतृत्व वाली झारखंड सरकार में एक प्रमुख गठबंधन सहयोगी है। यह स्थिति एक विरोधाभासी धारणा को जन्म देती है, जहां एक राष्ट्रीय नेता एक क्षेत्र में एक मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाता है, लेकिन उस राज्य में जहां उनकी पार्टी सत्ता में है, वहां इसी तरह की शिकायतों पर खामोश रहता है।
शासन और स्थिरता पर असर
शासन और राजनीतिक स्थिरता के दृष्टिकोण से, ऐसी स्थितियां स्थानीय जनमत को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। रांची के छात्र जुलाई के अंत से प्रदर्शन कर रहे हैं, JPSC और JSSC दोनों के भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार और स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं। इन विरोध प्रदर्शनों की तीव्रता और राज्य सरकार की प्रतिक्रिया, क्षेत्रीय राजनीतिक माहौल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।
राजनीतिक दांव-पेंच और प्रतिष्ठा का जोखिम
यह विकास प्रमुख दलों के राजनीतिक समीकरणों की जटिलताओं को उजागर करता है। जहां राहुल गांधी ने देश भर में छात्र आंदोलनों का समर्थन करने का वादा किया है, वहीं रांची के आंदोलन के प्रति उनकी उदासीनता को विरोधियों द्वारा राजनीतिक रूप से प्रेरित रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह उनकी सार्वजनिक छवि के लिए एक जोखिम पैदा कर सकता है, खासकर युवा मतदाताओं के बीच, और उन राज्यों में जवाबदेही पर सवाल खड़े कर सकता है जहां उनकी पार्टी सत्ता साझा करती है।
आगे क्या?
यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि गठबंधन सरकार बढ़ती छात्र मांगों को कैसे संभालती है और क्या राष्ट्रीय नेतृत्व अंततः झारखंड में उठाए गए विशिष्ट शिकायतों को संबोधित करता है। यदि इन मुद्दों का समाधान या स्वीकार नहीं किया जाता है, तो यह लंबे समय तक अस्थिरता पैदा कर सकता है, जिस पर क्षेत्रीय राजनीतिक परिदृश्य में नजर रखी जाएगी।
