14 अगस्त को भारत विभाजन की भयावहता को याद करने के लिए 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' मनाया जाता है। इस साल, पत्रकार कुलदीप नैयर की लिखी मुहम्मद अली जिन्ना की उस पीड़ा का ज़िक्र भी हो रहा है, जब उन्होंने बंटवारे के बाद हुए नरसंहार को देखा था। यह उन लाखों लोगों के दर्द को याद करने का दिन है जो इस त्रासदी से प्रभावित हुए थे।
भारत में हर साल 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के तौर पर मनाया जाता है। यह दिन 1947 में हुए भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन के दौरान अपनी जान गंवाने वाले लोगों और विस्थापित हुए लाखों लोगों को समर्पित है। जैसे-जैसे देश उस दौर को याद करता है, उस दौर की ऐतिहासिक कहानियां और व्यक्तिगत अनुभव सामने आते रहते हैं, जो इस त्रासदी की भयावहता को दर्शाते हैं।
इस साल की चर्चाओं में एक ऐसी ही कहानी सामने आई है, जो दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैयर की आत्मकथा 'बियॉन्ड द लाइन्स' से ली गई है। अपनी किताब में, नैयर ने पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना से जुड़ा एक किस्सा सुनाया है। नैयर के अनुसार, जिन्ना जब विभाजित पंजाब के ऊपर से उड़ान भर रहे थे, तब उन्होंने नीचे शरणार्थियों के बड़े पैमाने पर पलायन और फैली हुई अफरा-तफरी को देखा। मानव पीड़ा के इस विशाल दृश्य से वे इतने आहत हुए कि उन्होंने कथित तौर पर गहरी निराशा व्यक्त करते हुए कहा, "मैंने यह क्या कर दिया?"
यह किस्सा बताता है कि हिंसा की वास्तविकता और बड़े पैमाने पर हुए विस्थापन ने दोनों पक्षों के नेताओं को चौंका दिया था। शुरुआत में, कांग्रेस और मुस्लिम लीग सहित कई नेताओं को उम्मीद थी कि समुदाय नए बने देशों की सीमाओं के भीतर सह-अस्तित्व में रह सकेंगे। हालाँकि, सांप्रदायिक हिंसा का तेजी से बढ़ना और उसके बाद हुआ बड़े पैमाने पर जनसंख्या का आदान-प्रदान इन उम्मीदों को असंभव बना दिया, जिससे इतिहास में सबसे बड़े और सबसे दर्दनाक मानव प्रवासन में से एक हुआ।
कुलदीप नैयर का अपना अनुभव जिन्ना के हवाई दृष्टिकोण के विपरीत एक जमीनी हकीकत पेश करता है। नैयर ने सियालकोट से दिल्ली तक की अपनी यात्रा का वर्णन ऐसे समय के रूप में किया, जो डर से भरा हुआ था। सड़कें हिंसा के सबूतों और छोड़े गए सामानों से भरी थीं, जो उस समय के राजनीतिक फैसलों की व्यक्तिगत कीमत को दर्शाती थीं।
हालांकि यह जानकारी एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड है और इसका कोई वित्तीय, कॉर्पोरेट या शेयर बाजार से संबंध नहीं है, यह 14 अगस्त की राष्ट्रीय चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। इतिहास के जानकारों के लिए, यह दिन पीढ़ियों को हुई पीड़ा को पहचानने और उपमहाद्वीप के विभाजन के दौरान चुकाई गई भारी कीमत पर विचार करने का समय है।
