GCC सेटअप हुआ आसान: भारत में कंपनियां अब तेजी से कर पाएंगी विस्तार

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AuthorNeha Patil|Published at:
GCC सेटअप हुआ आसान: भारत में कंपनियां अब तेजी से कर पाएंगी विस्तार

अब भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) खोलना पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गया है। Embark जैसे प्लेटफॉर्म्स के नए ऑनलाइन टूल्स कंपनियों को लागत का तुरंत अनुमान लगाने में मदद कर रहे हैं, जिससे मिड-साइज्ड फर्मों के लिए भारत में एंट्री करना सरल हो गया है, लेकिन यह बड़ी कंसल्टिंग फर्मों के लिए एक चुनौती पेश कर रहा है।

भारत में GCC खोलना हुआ तेज!

भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) की स्थापना की प्रक्रिया अब पहले से कहीं ज्यादा तेज हो गई है। इसकी वजह बने हैं ऑटोमेटेड कॉस्ट कैलकुलेटर। पहले विदेशी कंपनियों को भारत में अपना सेंटर खोलने की लागत, सुविधाओं और ऑपरेशनल जरूरतों का अनुमान लगाने में महीनों लग जाते थे, और इसमें बड़ी कंसल्टिंग फर्मों की मदद लेनी पड़ती थी।

लेकिन अब Embark (एम्बेसी ग्रुप का एक वेंचर) जैसे प्लेटफॉर्म्स के साथ-साथ NeoIntelli और ScaleGCC जैसे फर्म्स भी वेब-बेस्ड टूल्स लेकर आए हैं। ये टूल्स अब कुछ ही मिनटों या दिनों में सारी जानकारी दे देते हैं।

मिड-साइज्ड कंपनियों के लिए बड़ा मौका

इस नए ट्रेंड से भारत का मार्केट उन मिड-साइज्ड विदेशी कंपनियों के लिए और भी सुलभ हो गया है, जिनके लिए पहले लंबी और महंगी कंसल्टिंग प्रक्रिया एक बड़ी बाधा थी। ये प्लेटफॉर्म्स ऑफिस स्पेस, आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टाफिंग बजट से लेकर हर चीज का कैलकुलेशन करने की सुविधा देते हैं। इससे कंपनियां अब बाहरी सलाहकारों पर निर्भर रहने के बजाय खुद ही अपनी शुरुआती प्लानिंग कर सकती हैं।

कंसल्टिंग इंडस्ट्री पर असर

इस बदलाव का असर कंसल्टिंग इंडस्ट्री पर भी देखने को मिल रहा है। Big Four जैसी बड़ी कंसल्टिंग फर्म्स, जो GCCs स्थापित करने की प्रक्रिया में मदद करके मोटा रेवेन्यू कमाती थीं, उनके लिए अब यह एक चुनौती है। ऑटोमेटेड और पारदर्शी डेटा की उपलब्धता से इन एडवाइजरी फर्मों के लिए रेवेन्यू के पारंपरिक स्रोत दबाव में आ सकते हैं। हालांकि, बड़े और जटिल प्रोजेक्ट्स में अभी भी इंसानी विशेषज्ञता की जरूरत होगी, लेकिन रूटीन कॉस्ट कैलकुलेशन और बेसिक ऑपरेटिंग मॉडल की परिभाषा अब ऑटोमेट हो रही है।

क्या हैं कैलकुलेटर की सीमाएं?

यह ध्यान रखना जरूरी है कि इन कैलकुलेटर्स की अपनी सीमाएं भी हैं। ये शुरुआती कैपिटल खर्च और ऑपरेशनल ओवरहेड्स का एक मोटा अनुमान तो दे सकते हैं, लेकिन 'छिपी हुई' लागतों की पूरी जटिलता को नहीं दर्शा पाते। ट्रांसफर प्राइसिंग रेगुलेशन, लोकल ग्रेच्युटी लॉ, जटिल टैक्स अनुपालन और बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में टैलेंट वॉर का असर जैसी चीजें ऑनलाइन टूल से मापना मुश्किल है। अगर कोई कंपनी सिर्फ इन ऑटोमेटेड अनुमानों पर निर्भर रहती है, तो उसे वास्तविक सेटअप के दौरान बजट से ज्यादा खर्च या ऑपरेशनल दिक्कतें आ सकती हैं।

आगे क्या?

निवेशकों के लिए, यह GCC मार्केट के परिपक्व होने का संकेत है। अब फोकस सिर्फ लागत कम करने से हटकर हाई-वैल्यू इनोवेशन, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और एडवांस इंजीनियरिंग पर जा रहा है। जैसे-जैसे एंट्री प्रोसेस आसान और तेज होगा, भारत के रियल एस्टेट और टेक सर्विस सेक्टर में पूंजी का प्रवाह तेज हो सकता है। अब यह देखना अहम होगा कि पारंपरिक कंसल्टिंग फर्म्स इन ऑटोमेटेड टूल्स का मुकाबला करने के लिए अपनी सेवाओं को कैसे बदलती हैं और क्या यह कम एंट्री बैरियर छोटे ग्लोबल फर्म्स को भारत में पैर जमाने के लिए प्रेरित करता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.