भारत में नोटबुक का इम्पोर्ट (Import) पहली छमाही 2026 में पांच गुना बढ़कर **₹22.36 करोड़** हो गया है। अब घरेलू निर्माता **9-10%** की सेफगार्ड ड्यूटी (Safeguard Duty) की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि 'शून्य' GST और ड्यूटी-फ्री इम्पोर्ट से प्रतिस्पर्धा का माहौल खराब हो रहा है, जिससे लोकल प्रोडक्शन पर भारी दबाव है।
क्या हैं टैक्स की दिक्कतें?
देश के नोटबुक निर्माता इन दिनों काफी दबाव में हैं। 2026 की पहली छमाही में नोटबुक इम्पोर्ट में भारी उछाल देखा गया। जनवरी से जून के बीच, इम्पोर्ट ₹22.36 करोड़ तक पहुंच गया, जो पिछले साल की समान अवधि में ₹3.65 करोड़ था। यह पांच गुना वृद्धि स्थानीय रूप से बने प्रोडक्ट्स की कम्पटीशन पर चिंता पैदा कर रही है।
इस समस्या की जड़ टैक्स स्ट्रक्चर में है। मौजूदा नियमों के तहत, नोटबुक पर गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) शून्य है। यह उपभोक्ताओं के लिए भले ही अच्छा हो, लेकिन निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती है। फाइनल प्रोडक्ट पर GST न होने के कारण, कंपनियां पेपर, बाइंडिंग सप्लाई और इंक जैसे कच्चे माल पर चुकाए गए टैक्स पर इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का दावा नहीं कर सकतीं। इसका मतलब है कि उत्पादन इनपुट पर चुकाए गए टैक्स अंतिम लागत में जुड़ जाते हैं, जिससे लोकल नोटबुक का प्रोडक्शन महंगा हो जाता है।
ट्रेड एग्रीमेंट्स का असर
घरेलू प्लेयर्स का यह भी कहना है कि वे ऐसे इम्पोर्टेड प्रोडक्ट्स से मुकाबला कर रहे हैं जिन्हें काफी टैक्स छूट मिलती है। कई इम्पोर्टेड नोटबुक, खासकर ASEAN देशों से आने वाले, फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (Free Trade Agreements) के कारण जीरो बेसिक कस्टम्स ड्यूटी (BCD) और इंटीग्रेटेड GST (IGST) के साथ भारत में प्रवेश करते हैं। इससे विदेशी सप्लायर्स को लोकल निर्माताओं पर एक बड़ा प्राइस एडवांटेज (Price Advantage) मिलता है, जिन्हें उत्पादन पर लगे टैक्स का बोझ उठाना पड़ता है।
सेफगार्ड ड्यूटी की मांग
इन हालातों को देखते हुए, ऑल इंडिया नोटबुक मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (AINMA) ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है। उद्योग निकाय एक्सरसाइज बुक्स पर तुरंत 9% से 10% की सेफगार्ड या कॉम्पेंसेटरी इम्पोर्ट ड्यूटी (Compensatory Import Duty) चाहता है। निर्माताओं का मानना है कि इससे इनपुट टैक्स क्रेडिट के अभाव के कारण होने वाले कॉस्ट डिसएडवांटेज (Cost Disadvantage) को खत्म करने और विदेशी सप्लायर्स के साथ बराबरी का मौका मिलेगा।
उद्योग का कहना है कि वे संरक्षणवाद (Protectionism) नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष माहौल चाहते हैं, जहां स्थानीय निर्माताओं को मौजूदा टैक्स डिजाइन के कारण नुकसान न हो। यह स्थिति स्टेशनरी और पेपर प्रोडक्ट सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय बनी हुई है, क्योंकि लगातार मार्जिन पर दबाव घरेलू विनिर्माण इकाइयों की दीर्घकालिक व्यवहार्यता (Long-term Viability) को प्रभावित कर सकता है। हितधारकों (Stakeholders) के लिए अगला बड़ा अपडेट सरकार का यह फैसला होगा कि क्या वह अनुरोधित सेफगार्ड ड्यूटी लागू करती है या स्थानीय निर्माताओं पर बोझ कम करने के लिए टैक्स ढांचे को समायोजित करती है।
