Nifty में आई तेजी! पर सोना और अमेरिकी शेयर हुए भारत से आगे, आखिर क्यों?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Nifty में आई तेजी! पर सोना और अमेरिकी शेयर हुए भारत से आगे, आखिर क्यों?

भारतीय शेयर बाजार के लिए पिछला एक साल काफी मुश्किल रहा है। निफ्टी 50 (Nifty 50) में आज थोड़ी रिकवरी देखने को मिली, लेकिन पिछले कुछ समय से यह सोने (Gold) और अमेरिकी शेयरों (US Stocks) की तुलना में काफी पिछड़ गया है। ऐसे में, निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो को संतुलित रखने की ज़रूरत है, क्योंकि विदेशी निवेश (Foreign Investment) रिकॉर्ड निचले स्तर पर है और ग्लोबल इकोनॉमी में भी अनिश्चितता छाई हुई है।

भारतीय बाजार में दिखी रिकवरी की झलक

भारतीय शेयर बाजार ने 20 अगस्त 2026 को कुछ राहत के संकेत दिखाए, जब निफ्टी 50 में 0.5% से ज़्यादा की बढ़त दर्ज की गई। यह तेजी पिछले सात दिनों की लगातार गिरावट के बाद आई है। हालांकि, पिछले बारह महीनों के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय इक्विटी (Indian Equities) ने सोने और अमेरिकी शेयरों के मुकाबले काफी कम प्रदर्शन किया है।

सोना और अमेरिकी बाजार क्यों चमके?

पिछले एक साल में सोने की कीमतों में करीब 34.6% का उछाल आया है। इसकी वजह ग्लोबल मॉनेटरी पॉलिसी में बदलाव और डॉलर का कमजोर होना बताया जा रहा है। वहीं, अमेरिकी शेयर बाजारों, जैसे S&P 500 और Nasdaq 100 ने डबल-डिजिट में शानदार ग्रोथ दिखाई है। यह दिखाता है कि कैसे अलग-अलग एसेट क्लास में लीडरशिप बदलती रहती है।

विदेशी निवेश में भारी गिरावट

भारतीय बाजार के पिछड़ने की एक बड़ी वजह विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना है। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय शेयरों में विदेशी निवेश पिछले 17 सालों के सबसे निचले स्तर पर आ गया है। विदेशी निवेशकों की कम भागीदारी से बाजार में अस्थिरता बढ़ी है और घरेलू इंडेक्स ग्लोबल संकेतों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो गए हैं। हालांकि, आज अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की बायबैक (Buybacks) की खबरों से सेंटिमेंट में थोड़ी सुधार आया है।

लॉन्ग-टर्म निवेशकों के लिए क्या है उम्मीद?

शॉर्ट-टर्म में प्रदर्शन भले ही कमज़ोर रहा हो, लेकिन लॉन्ग-टर्म के लिए ऐतिहासिक आंकड़े अच्छी तस्वीर पेश करते हैं। पिछले दो दशकों में, निफ्टी 50 ने सालाना करीब 12% का रिटर्न दिया है। 1999 से शुरू हुए सात-साल के इन्वेस्टमेंट पीरियड को देखें तो लगभग सभी में निवेशकों को पॉजिटिव रिटर्न मिला है। यह बताता है कि धैर्य रखने वाले निवेशकों को भारतीय बाजार ने हमेशा फायदा पहुंचाया है।

मौजूदा जोखिम और आगे की राह

निवेशकों को मौजूदा ग्लोबल इकोनॉमिक जोखिमों पर भी ध्यान देना चाहिए। बढ़ता हुआ जियो-पॉलिटिकल तनाव (Geopolitical Uncertainty) और महंगाई (Inflation) ग्लोबल बाजारों पर दबाव बना रहे हैं। इसके अलावा, कच्चे तेल (Crude Oil) की ऊंची कीमतें भारतीय इकोनॉमी के लिए बड़ी चिंता का विषय हैं, क्योंकि यह इंपोर्ट बिल और रुपये की स्थिरता को प्रभावित करती हैं। ऐसे में, जो एसेट्स पहले ही बहुत बढ़ चुके हैं, उनके पीछे भागना खतरनाक हो सकता है।

मार्केट को टाइम करने या तेज़ी वाले एसेट्स में पूरी तरह से निवेश करने के बजाय, एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि एक डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो (Diversified Portfolio) ही सबसे असरदार रणनीति है। यह मार्केट का एक महत्वपूर्ण सबक है कि एसेट लीडरशिप साइक्लिकल (Cyclical) होती है। निवेशकों को अब विदेशी निवेश के स्थिर होने और डोमेस्टिक कॉर्पोरेट अर्निंग्स (Corporate Earnings) में ग्रोथ पर नज़र रखनी चाहिए, जो बाजार की रिकवरी को सपोर्ट कर सकें।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.