FY26 में भारत की टॉप 50 कंपनियों के CEO की कुल सैलरी **15%** बढ़कर रिकॉर्ड **₹1,443 करोड़** पर पहुंच गई है। यानी, हर CEO की औसत कमाई अब करीब **₹29 करोड़** है। लेकिन, शेयरधारकों के लिए चिंता की बात यह है कि यह इजाफा इंडेक्स की कमाई में हुई **4.5%** की धीमी ग्रोथ के मुकाबले काफी ज्यादा है।
CEO की कमाई में तूफानी उछाल
साल 2026 के फाइनेंशियल ईयर में, भारत की टॉप 50 कंपनियों के चीफ एग्जीक्यूटिव्स (CEO) की कुल सैलरी ₹1,443 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। यह पिछले साल के मुकाबले 15% ज्यादा है, जिससे हर CEO की औसत कमाई बढ़कर करीब ₹29 करोड़ हो गई है, जो पिछले साल ₹25 करोड़ थी। कंपनियों की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, यह आंकड़े देश की सबसे बड़ी लिस्टेड कंपनियों में एग्जीक्यूटिव्स पर बढ़ते खर्च को दर्शाते हैं।
प्रदर्शन बनाम सैलरी: निवेशकों का सवाल
बाजार के जानकारों के लिए यह गौर करने वाली बात है कि जहां CEO की सैलरी दो अंकों में बढ़ी है, वहीं Nifty 50 इंडेक्स की कमाई में इसी अवधि में केवल 4.5% की मामूली ग्रोथ देखी गई है। शेयरधारकों के लिए यह गैप एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या कंपनी के प्रदर्शन और एग्जीक्यूटिव की सैलरी के बीच कोई सीधा संबंध है?
यह सच है कि कई एग्जीक्यूटिव्स की सैलरी का एक बड़ा हिस्सा परफॉरमेंस-लिंक्ड इंसेंटिव, जैसे स्टॉक ऑप्शन या बोनस पर निर्भर करता है। लेकिन, कमाई और सैलरी में इतनी बड़ी बढ़ोतरी का अंतर अब सालाना आम बैठकों (AGMs) में जांच का अहम मुद्दा बन गया है।
अलग-अलग सेक्टरों में सैलरी का फासला
आंकड़े बताते हैं कि अलग-अलग सेक्टरों और कंपनियों में सैलरी की संरचना में काफी अंतर है। उदाहरण के लिए, HCL टेक्नोलॉजीज के C. विजयकुमार और लार्सन एंड टुब्रो (L&T) के S.N. सुब्रमण्यन जैसे टॉप लीडर्स की सालाना कमाई ₹100 करोड़ के पार चली गई। वहीं, दूसरी तरफ, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) जैसे पब्लिक सेक्टर के एग्जीक्यूटिव्स को प्राइवेट सेक्टर के मुकाबले काफी कम सैलरी मिलती है।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
निवेशकों के नजरिए से, सैलरी की कुल रकम जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी संरचना भी है। इन पैकेजों का एक बड़ा हिस्सा 'वेरिएबल' यानी प्रदर्शन पर आधारित होता है। अगर टारगेट बहुत आक्रामक हों, तो हाई सैलरी मजबूत परफॉरमेंस का संकेत दे सकती है। लेकिन, अगर कमाई पर दबाव बना रहता है, तो निवेशकों को कंपनियों से इन बढ़ोतरी को सही ठहराने के लिए और स्पष्टीकरण मांगने की जरूरत पड़ सकती है। कंपनी गवर्नेंस और सैलरी कैलकुलेशन में पारदर्शिता, शेयरधारकों के लिए मैनेजमेंट से जुड़े प्रस्तावों पर वोटिंग करते समय महत्वपूर्ण हो जाती है।
आगे चलकर, निवेशक कंपनियों की सालाना रिपोर्ट और इन्वेस्टर प्रेजेंटेशन में फिक्स्ड और वेरिएबल सैलरी के ब्रेकअप पर नजर रखेंगे। सैलरी में बढ़ोतरी का यह ट्रेंड जारी रहेगा या नहीं, यह प्रॉफिट मार्जिन और कमाई में रिकवरी के साथ-साथ इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स द्वारा सस्टेनेबल पे प्रैक्टिस पर बढ़ते फोकस पर भी निर्भर करेगा।
