आयकर विभाग ने नया 'फॉर्म 168' पेश किया है, जो अब तक के फॉर्म 26AS और एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) का मिलाजुला रूप होगा। यह नया फॉर्म 2026-27 टैक्स ईयर से लागू होगा। हालांकि, 2025-26 के फाइनेंशियल ईयर के लिए आपको अब भी पुराने फॉर्म 26AS का ही इस्तेमाल करना होगा।
फॉर्म 168 vs फॉर्म 26AS: क्या है बड़ा बदलाव?
आयकर विभाग ने अपने ई-फाइलिंग पोर्टल पर एक नया रिपोर्टिंग डॉक्यूमेंट 'फॉर्म 168' जारी किया है। यह बदलाव इनकम टैक्स एक्ट 2025 के तहत किया गया है, जिसका मकसद टैक्सपेयर्स के लिए वित्तीय और टैक्स संबंधी जानकारी को देखना आसान बनाना है। इस बदलाव की टाइमलाइन को समझना टैक्स फाइलिंग के दौरान किसी भी कन्फ्यूजन से बचने के लिए बेहद जरूरी है।
अभी जो फाइलिंग पीरियड चल रहा है, यानी फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए, टैक्सपेयर्स को मौजूदा फॉर्म 26AS का ही इस्तेमाल करना होगा। वहीं, नया फॉर्म 168 खासतौर पर 2026-27 टैक्स ईयर और उसके बाद के लिए है। जहां फॉर्म 26AS में पहले से काटे गए टैक्स (TDS) और टैक्स क्रेडिट का रिकॉर्ड होता था, वहीं नया फॉर्म 168 एक 'ऑल-इन-वन' डॉक्यूमेंट की तरह काम करेगा। इसमें वे सारी जानकारी शामिल होगी जो पहले फॉर्म 26AS और एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) में अलग-अलग दिखती थी। इस एकत्रीकरण से विभाग का मकसद इंडिविजुअल टैक्सपेयर्स के लिए एक बेहतर रिकंसिलिएशन टूल तैयार करना है।
टैक्सपेयर्स के लिए क्या बदलेगा?
फॉर्म 168 का मुख्य उद्देश्य टैक्सपेयर की वित्तीय गतिविधियों का एक सिंगल और विस्तृत व्यू देना है। इसमें चुकाए गए टैक्स, सरकारी डिमांड, पेंडिंग रिफंड और थर्ड-पार्टी (जैसे बैंक, एम्प्लॉयर, इन्वेस्टमेंट फर्म) द्वारा रिपोर्ट की गई वित्तीय जानकारी शामिल होगी। क्योंकि यह नया फॉर्म एक कंसोलिडेटेड रिकॉर्ड के तौर पर काम करेगा, इसलिए इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते समय टैक्सपेयर्स को कई डॉक्यूमेंट्स को खंगालने की जरूरत कम पड़ेगी। टैक्स एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस बदलाव से पारदर्शिता बढ़ेगी और इंडिविजुअल्स को अपनी रिपोर्ट की गई इनकम या टैक्स पेमेंट में किसी भी गड़बड़ी का पता जल्दी चल सकेगा।
डेटा रिकंसिलिएशन की अहमियत
चाहे कोई भी फॉर्म सक्रिय हो, टैक्सपेयर की मुख्य जिम्मेदारी हमेशा यह सुनिश्चित करना है कि रिपोर्ट किया गया सारा फाइनेंशियल डेटा सटीक हो। टैक्स प्रोफेशनल्स इस बात पर जोर देते हैं कि टैक्सपेयर्स को अपनी सैलरी स्लिप, बैंक से मिले इंटरेस्ट इनकम, फॉर्म 16 जैसे TDS सर्टिफिकेट्स और इन्वेस्टमेंट ट्रांजैक्शन्स को टैक्स पोर्टल पर दी गई जानकारी से क्रॉस-वेरीफाई करना चाहिए। रिफंड में देरी या रिपोर्टिंग की गलतियों के कारण टैक्स अथॉरिटीज से नोटिस आने जैसी आम दिक्कतों से बचने के लिए प्रोएक्टिव रिकंसिलिएशन बहुत जरूरी है। अगले साल फॉर्म 168 में सिस्टम के ट्रांजिशन के साथ ही, इन्वेस्टर्स और टैक्सपेयर्स का फोकस साल भर अपने फाइनेंशियल रिकॉर्ड्स को दुरुस्त रखने पर होना चाहिए, न कि केवल फाइलिंग की आखिरी डेडलाइन का इंतजार करने पर। इन्वेस्टर्स को 2026-27 टैक्स साइकिल के नजदीक आने पर ई-फाइलिंग पोर्टल पर फॉर्म 168 के लेआउट और एक्सेसिबिलिटी से जुड़ी नई अपडेट्स पर भी नजर रखनी चाहिए।
