भारत की नई शिक्षा नीति 2020 अब 'होल लैंग्वेज' (Whole Language) टीचिंग मेथड से आगे बढ़ रही है। यह तरीका बच्चों को शब्दों को डिकोड करने के बजाय अंदाजा लगाने के लिए प्रोत्साहित करता था। इस बदलाव का मकसद रीडिंग गैप को ठीक करना है, जो स्कूलों में इस अप्रमाणित सिद्धांत को अपनाने के बाद सामने आया। अब व्यवस्थित 'फोनेटिक्स' (Phonics) पर ध्यान केंद्रित करने से साक्षरता के नतीजे बेहतर होने की उम्मीद है, खासकर उन छात्रों के लिए जिन्हें घर पर अतिरिक्त मदद नहीं मिलती।
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अनुमान लगाने से डिकोडिंग की ओर
'होल लैंग्वेज' मेथड में बच्चों को शब्दों के कोड को समझने के बजाय, कॉन्टेक्स्ट (संदर्भ) या तस्वीरों की मदद से शब्दों को पहचानने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। लेकिन, साइंस (Science) के अनुसार, जो बच्चे अच्छे से पढ़ सकते हैं, वे शब्दों को देखकर अंदाजा नहीं लगाते, बल्कि तेजी से और अपने आप डिकोड करते हैं। इस मेथड ने अनजाने में बच्चों में मुश्किलों से पढ़ने की आदत डाल दी। एक्सपर्ट्स का कहना है कि चूंकि लिखना सीखना एक स्किल (Skill) है, न कि बोलने जैसी जन्मजात क्षमता, इसलिए अक्षरों और आवाजों को जोड़ना सिखाना, बच्चों के कॉग्निटिव डेवलपमेंट (Cognitive Development) के लिए बहुत ज़रूरी है।
दुनिया भर की गलतियों से सीख
भारत का यह अनुभव अमेरिका में पहले आई चुनौतियों जैसा ही है। साल 1987 में कैलिफ़ोर्निया ने 'होल लैंग्वेज' आधारित रीडिंग मॉडल लागू किए, जिसके चलते छात्रों की पढ़ने की क्षमता में भारी गिरावट आई। 1990 के दशक के आखिर में 'रीडिंग वॉर्स' (Reading Wars) के बाद, 2000 में US नेशनल रीडिंग पैनल (US National Reading Panel) ने निष्कर्ष निकाला कि व्यवस्थित फोनेटिक्स (Systematic Phonics Instruction) – यानी अक्षरों और आवाजों के बीच संबंध सिखाना – पढ़ने का सबसे प्रभावी तरीका है। टेस्ट स्कोर में सालों तक ठहराव के बाद इन निष्कर्षों को अमेरिका के करिकुलम (Curriculum) में व्यापक रूप से स्वीकार करने में दो दशक लग गए। यह अप्रमाणित टीचिंग थ्योरीज़ (Pedagogical Theories) के लंबे समय के असर के लिए एक चेतावनी है।
भारत में साक्षरता का भविष्य
नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 का लागू होना, सबूत-आधारित (Evidence-based) पढ़ाई की ओर एक बड़ा कदम है। भारतीय भाषाएँ, जिनमें अक्सर स्पष्ट, शब्दांश-आधारित (Syllable-based) स्क्रिप्ट होती हैं, उन्हें सीधे कोड सिखाने के लिए बहुत उपयुक्त माना जाता है। जिन परिवारों में माता-पिता की तरफ से पढ़ाई-लिखाई में ज़्यादा मदद नहीं मिलती, उन बच्चों के लिए स्कूल ही पढ़ने सीखने का मुख्य जरिया है। इसलिए, व्यवस्थित और शुरुआती स्तर पर निर्देश देना, साक्षरता के अंतर को पाटने के लिए एक आवश्यक कदम माना जा रहा है। इस बदलाव का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अक्षरों को डिकोड करना, पढ़ने की बुनियादी सीढ़ी बने, ताकि बच्चे बाद में शब्दों को पहचानने के बजाय समझने पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकें।
