Mpower की फाउंडर Neerja Birla ने कंपनियों से अपील की है कि वे मेंटल हेल्थ के प्रति सिर्फ जागरूकता ही न फैलाएं, बल्कि इसे अपने वर्कप्लेस सिस्टम का अभिन्न अंग बनाएं। निवेशकों के लिए यह संकेत है कि अब कंपनियों की सफलता में ह्यूमन कैपिटल मैनेजमेंट एक बड़ा फैक्टर बन गया है।
वर्कप्लेस पर स्ट्रक्चरल बदलाव की जरूरत
Aditya Birla Education Trust की चेयरपर्सन और Mpower की फाउंडर Neerja Birla ने साफ कहा है कि कॉर्पोरेट इंडिया को मेंटल हेल्थ के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा। अब तक कंपनियां सिर्फ दिखावे के लिए HR इनिशिएटिव्स चलाती आई हैं, लेकिन जरूरत इस बात की है कि मेंटल हेल्थ सपोर्ट—जैसे शुरुआती स्क्रीनिंग और कॉन्फिडेंशियल काउंसलिंग—को कंपनी के कल्चर में ही समाहित किया जाए।
क्यों है यह एक बड़ा इकोनॉमिक रिस्क?
इसे सिर्फ एक सोशल कॉज न समझें, यह बिजनेस की इकोनॉमिक जरूरत बन गया है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के आंकड़ों के मुताबिक, चिंता और डिप्रेशन के कारण होने वाली प्रॉडक्टिविटी की कमी वैश्विक अर्थव्यवस्था को सालाना $1 ट्रिलियन का नुकसान पहुंचा रही है। शेयरधारकों के लिए यह एक सीधा रिस्क है, क्योंकि खराब मानसिक स्वास्थ्य का असर एम्प्लॉई एट्रिशन (नौकरी छोड़ने की दर), कम इंगेजमेंट और कंपनी की परफॉर्मेंस पर पड़ता है।
कैसे बदलेगा भविष्य का कॉर्पोरेट मॉडल?
Birla के अनुसार, कंपनियों को अब 'क्राइसिस रिस्पॉन्स' (समस्या आने पर रिएक्ट करना) के बजाय एक 'प्रिवेंटिव मॉडल' (रोकथाम पर ध्यान) की ओर बढ़ना होगा। उनके प्रोजेक्ट 'Mann' और 'Nirmal' इसके बेहतरीन उदाहरण हैं। उन्होंने साबित किया है कि बिना किसी भारी-भरकम क्लिनिकल टीम के भी एक बेहतर सिस्टम के जरिए वर्कफोर्स की देखभाल की जा सकती है।
निवेशकों के लिए टेकअवे
इन्वेस्टर्स अब कंपनियों के ESG (Environment, Social, and Governance) स्कोर को गहराई से देख रहे हैं। जो कंपनियां अपने कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक ठोस सिस्टम (Institutionalized System) बना रही हैं, वे टैलेंट रिटेंशन और लॉन्ग-टर्म स्टेबिलिटी के मामले में कहीं बेहतर स्थिति में होंगी। आने वाले समय में बाजार इस बात पर नजर रखेगा कि कौन सी कंपनियां अपनी कोर बिजनेस स्ट्रैटेजी में वेलनेस प्रोग्राम्स को कैसे जोड़ती हैं।
