नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के एमडी और सीईओ, आशीष चौहान ने भारतीय स्टार्टअप्स और छोटे व मध्यम उद्यमों (MSMEs) को सलाह दी है कि वे अपने बिजनेस को बढ़ाने के लिए पब्लिक लिस्टिंग यानी IPO का रास्ता अपनाएं। उन्होंने कहा कि इससे फंड जुटाने के साथ-साथ कंपनी का कंट्रोल भी बना रहता है।
क्यों अपनाएं IPO का रास्ता?
NSE के आशीष चौहान ने JITO इं.क्यूबेशन एंड इनोवेशन फाउंडेशन के एक कार्यक्रम में कहा कि पब्लिक मार्केट, बैंक लोन या प्राइवेट इक्विटी (PE) जैसे पारंपरिक तरीकों से फंड जुटाने का एक बेहतर विकल्प है। IPO के जरिए कंपनियां ग्रोथ के लिए जरूरी कैपिटल जुटा सकती हैं, लेकिन साथ ही फाउंडर्स अपना ऑपरेशनल कंट्रोल भी बनाए रख सकते हैं।
फंड और कंट्रोल का संतुलन
स्टार्टअप फाउंडर्स के लिए अक्सर यह दुविधा होती है कि पैसा जुटाने के चक्कर में कहीं कंपनी का कंट्रोल तो नहीं चला जाएगा। PE और वेंचर कैपिटल (VC) फर्म्स बिजनेस के फैसलों में दखलअंदाजी करती हैं। लेकिन IPO में, कंपनी आमतौर पर पब्लिक को 25% तक की हिस्सेदारी बेचती है, जिससे फाउंडर्स बड़े फंड्स तक पहुंच पाते हैं और मैनेजमेंट कंट्रोल भी उन्हीं के पास रहता है।
बेहतर वैल्यूएशन और 'स्ट्रैटेजिक करेंसी'
चौहान के मुताबिक, पब्लिक मार्केट में कंपनियों को प्राइवेट मार्केट के मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर वैल्यूएशन मिलता है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई कंपनी सालाना ₹2 करोड़ का प्रॉफिट कमा रही है, तो पब्लिक लिस्टिंग के बाद उसकी मार्केट कैप ₹40 करोड़ से ₹50 करोड़ तक पहुंच सकती है।
लिस्टेड शेयर एक तरह की 'स्ट्रैटेजिक करेंसी' का काम करते हैं। इससे कंपनियां एक्विजिशन (Acquisitions), स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप (Strategic Partnerships), शेयर गिरवी रखकर एडिशनल फंड जुटाने या फिर टॉप टैलेंट को आकर्षित करने के लिए एम्प्लॉई स्टॉक ऑप्शन (ESOPs) जारी करने जैसे काम आसानी से कर सकती हैं। उन्होंने Infosys का उदाहरण देते हुए कहा कि कंपनी ने शुरुआती दौर में अपनी लिस्टेड स्टेटस का खूब फायदा उठाया था।
SME लिस्टिंग की असलियत
पब्लिक लिस्टिंग भले ही आकर्षक हो, लेकिन इसके साथ कुछ जिम्मेदारियां भी आती हैं। लिस्टेड कंपनियों को NSE और SEBI (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) के सख्त नियमों का पालन करना होता है। इसमें रेगुलर फाइनेंशियल डिस्क्लोजर, इंडिपेंडेंट ऑडिट और ट्रांसपरेंट कॉर्पोरेट गवर्नेंस शामिल हैं। इन सबका एडमिनिस्ट्रेटिव और कंप्लायंस कॉस्ट प्राइवेट कंपनियों से ज्यादा होता है।
NSE Emerge जैसे प्लेटफॉर्म्स पर लिस्ट होने वाली छोटी कंपनियों की लिक्विडिटी (Liquidity) मेनबोर्ड लिस्टिंग से अलग हो सकती है। ऐसे में इन्वेस्टर्स गवर्नेंस क्वालिटी और प्रॉफिट ट्रैक रिकॉर्ड पर ज्यादा ध्यान देते हैं।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या है खास?
जैसे-जैसे ज्यादा स्टार्टअप्स और SME पब्लिक मार्केट में आ रहे हैं, इन्वेस्टर्स के लिए उनकी डिस्क्लोजर क्वालिटी और लिस्टिंग के बाद प्रॉफिटेबिलिटी बनाए रखने की क्षमता महत्वपूर्ण होगी। SEBI लगातार SME IPOs के नियमों को अपडेट करता रहता है ताकि फेयर प्रैक्टिसेस बनी रहें। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि क्या ये कंपनियां पब्लिक मार्केट में अपनी वैल्यूएशन को बनाए रख पाती हैं।
