National Highways Authority of India (NHAI) ने टोल प्लाजा के लिए नए नियम लागू किए हैं। अब 'मल्टी-लेन फ्री फ्लो' (MLFF) सिस्टम के जरिए टोल प्लाजा को अधिकतम **8** लेन तक सीमित किया जाएगा, जिससे जमीन अधिग्रहण की लागत कम होगी।
तकनीक से बदलेगी तस्वीर
NHAI ने आदेश दिया है कि भविष्य में बनने वाले सभी नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट्स पर टोल प्लाजा 8 लेन से बड़े नहीं होंगे। अभी तक व्यस्त रास्तों पर 32 लेन तक की जरूरत पड़ती थी। अब फिजिकल बूथ की जगह 'ओवरहेड गैंट्री' लगाई जाएगी, जिसमें ANPR (ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकॉग्निशन) और RFID रीडर्स लगे होंगे। इससे गाड़ियां बिना रुके टोल क्रॉस कर सकेंगी, जिससे जाम की समस्या खत्म होगी।
इंफ्रा सेक्टर के लिए क्यों है अहम?
सड़क बनाने वाली कंपनियों के लिए जमीन अधिग्रहण करना सबसे बड़ी चुनौती और महंगा काम होता है। टोल प्लाजा का साइज छोटा होने से कंपनियों का कैपिटल खर्च (Capex) कम होगा। यह नियम उन प्रोजेक्ट्स पर भी लागू होगा जो अभी प्लानिंग स्टेज में हैं या जहां अभी टोल प्लाजा का निर्माण शुरू नहीं हुआ है।
रिस्क फैक्टर और चुनौतियां
हालांकि यह बदलाव लैंड कॉस्ट कम करेगा, लेकिन इसके साथ कुछ रिस्क भी जुड़े हैं। पूरे सिस्टम की सफलता ANPR और RFID की सटीकता पर निर्भर करेगी। अगर तकनीक में कोई खराबी आती है या नंबर प्लेट्स सही से नहीं पढ़ी जाती हैं, तो टोल ऑपरेटर्स को रेवेन्यू का नुकसान हो सकता है। साथ ही, कंपनियों को अपने बैक-एंड सॉफ्टवेयर और डेटा मैनेजमेंट सिस्टम को अपग्रेड करना होगा, जिसे निवेशकों को बारीकी से ट्रैक करने की जरूरत है।
