नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने पर्यावरण नियमों के पालन को लेकर सख्ती बढ़ा दी है। पुणे और रांची में नदी प्रदूषण मामलों में दखल के बाद इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के लिए अनुपालन और प्रोजेक्ट समय पर पूरा करने का जोखिम बढ़ गया है।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) इन दिनों रिवर पॉल्यूशन और वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाए हुए है। हाल ही में पुणे और रांची की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर ट्रिब्यूनल की कार्रवाई यह दर्शाती है कि शहरी भारत में बड़े प्रोजेक्ट्स को लागू करना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
पुणे में 'मुला-मुथा' प्रोजेक्ट की चुनौतियां
पुणे मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा संचालित 'मुला-मुथा' नदी सफाई परियोजना फिलहाल न्यायिक निगरानी में है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य नदी में गिर रहे गंदे पानी को रोकना है, लेकिन पर्यावरण मंजूरी और प्रोजेक्ट की गति के बीच संतुलन न बन पाने के कारण यह NGT के निशाने पर है। यह स्थिति बताती है कि स्थानीय प्रशासन को पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले असर के लिए अब पहले से कहीं अधिक जवाबदेह होना पड़ेगा।
रांची में प्रशासनिक तालमेल का अभाव
रांची का मामला अलग तरह की सीख देता है। यहाँ 'हरमू' नदी के किनारे स्थित 7 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बेकार पड़े हैं। रांची म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन और झारखंड अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कंपनी के बीच चल रहा आपसी विवाद इस बात का सबूत है कि केवल बजट पास करना काफी नहीं है, बल्कि ऑपरेशनल मेंटेनेंस (Operational Maintenance) भी उतनी ही जरूरी है। NGT अब इन संस्थाओं पर दबाव बना रही है ताकि फैसिलिटीज को दोबारा शुरू किया जा सके।
निवेशकों के लिए सबक
भले ही ये मामले सार्वजनिक निकायों से जुड़े हों, लेकिन इनका असर पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर पर पड़ता है। NGT का सक्रिय रुख अचानक काम रोकने (Stop-work order), प्रोजेक्ट में देरी और लागत बढ़ने (Cost overrun) के जोखिम को बढ़ाता है। आज के दौर में कंपनियों के लिए ESG अनुपालन अनिवार्य हो चुका है। लिस्टेड कंपनियों के लिए पर्यावरण संबंधी देरी केवल तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ा फाइनेंशियल रिस्क बन चुका है, जो सीधे रेवेन्यू रिकग्निशन (Revenue recognition) को प्रभावित करता है। अब निवेशकों को इंफ्रा स्टॉक्स चुनते समय कंपनियों के कानूनी रिकॉर्ड और पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया को बारीकी से परखना होगा।
