सड़क और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने निर्माण कार्यों में भारी लापरवाही बरतने वाली दो हाईवे कंपनियों को बड़ा झटका दिया है। इन कंपनियों को अगले **2 साल** तक किसी भी सरकारी प्रोजेक्ट में बोली लगाने से प्रतिबंधित कर दिया गया है।
सड़क और राजमार्ग मंत्रालय ने इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में सुरक्षा मानकों को लेकर 'जीरो-टॉलरेंस' नीति अपनाते हुए दो प्रमुख हाईवे डेवलपर्स पर 2 साल का बैन लगा दिया है। निर्माण में गंभीर खामियों के चलते कंपनियों पर यह गाज गिरी है। इस प्रतिबंध के साथ ही कंपनियों की क्रेडिट रेटिंग भी घटा दी गई है, जिससे कर्ज लेने की लागत (Cost of Borrowing) बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
पहला मामला: तमिलनाडु में सड़क धंसी
पहला मामला ओरिएंटल (Oriental) द्वारा प्रमोट की गई एक स्पेशल पर्पस व्हीकल से जुड़ा है, जो NH-32 के पूंडियानकुप्पम-सत्तनथापुरम सेक्शन के लिए जिम्मेदार थी। 6 अप्रैल, 2026 को कोल्लिदम बाईपास के पास सड़क का कंक्रीट 2 मीटर तक धंस गया था। इसे इंजीनियरिंग मानकों की भारी विफलता माना गया।
दूसरा मामला: यूपी में जानलेवा हादसा
वहीं, एक अन्य मामले में मंत्रालय ने VRC Constructions (India) Pvt Ltd और R & C Infra Engineers Pvt Ltd के जॉइंट वेंचर पर सख्त कार्रवाई की है। 25 मार्च, 2026 को NH-727B पर घाघरा नदी पुल के निर्माण के दौरान एक पियर का रिइंफोर्समेंट पिंजरा गिर गया था, जिसमें 2 मजदूरों की मौत हो गई थी।
निवेशकों के लिए क्या है मतलब?
- ऑर्डर बुक पर असर: नए प्रोजेक्ट्स से बाहर होने के कारण कंपनियों का रेवेन्यू ग्रोथ प्रभावित हो सकता है।
- फाइनेंशियल स्ट्रेस: निगेटिव क्रेडिट रेटिंग और बैंकों से महंगे कर्ज के चलते प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
- अनिश्चितता: इस बैन और कानूनी विवादों के कारण कंपनियों की मार्केट साख को बड़ा नुकसान पहुंचा है। निवेशकों को कंपनी की आने वाली आधिकारिक जानकारियों और कानूनी अपीलों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए।
