Kochi में चल रहे TREVOR-SAFARI सिम्पोजियम में एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि मरीन हीटवेव्स के कारण मछलियों का माइग्रेशन और कोस्टल इकोनॉमी खतरे में है। अब सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए सैटेलाइट और AI आधारित सिस्टम पर जोर दिया जा रहा है।
कोच्चि स्थित ICAR-Central Marine Fisheries Research Institute (CMFRI) में 4 से 6 नवंबर, 2026 तक चल रहे TREVOR-SAFARI सिम्पोजियम में 30 देशों के वैज्ञानिक समुद्री लहरों के बढ़ते तापमान (Marine Heatwaves) के आर्थिक खतरों पर मंथन कर रहे हैं।
इकोनॉमी पर गहरा असर
यह सिर्फ एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि 'ब्लू इकोनॉमी' के लिए बड़ा वित्तीय संकट है। मछलियों के माइग्रेशन में बदलाव, फिशरीज़ का बंद होना और ऑयस्टर (oysters) जैसी प्रजातियों की मौतों से कोस्टल लॉजिस्टिक्स और प्रोसेसिंग कंपनियों का कामकाज प्रभावित हो रहा है। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि कैसे क्लाइमेट रिस्क अब कंपनियों के ऑपरेशनल परफॉरमेंस को सीधा हिट कर रहा है।
टेक्नोलॉजी का सहारा
इस अनिश्चितता को दूर करने के लिए अब 'डेटा-ड्रिवन' मैनेजमेंट पर जोर दिया जा रहा है। भारत इसमें ISRO के EOS-06 (Oceansat-3) सैटेलाइट का उपयोग कर रहा है। इसमें लगा Ocean Colour Monitor-3 (OCM-3) इंस्ट्रूमेंट समुद्र में क्लोरोफिल-ए की मात्रा ट्रैक कर मछलियों के संभावित इलाकों (Potential Fishing Zones) की सटीक जानकारी दे रहा है।
भविष्य की रणनीति
इसके अलावा, 3 नवंबर, 2026 को लॉन्च हुआ Bay of Bengal Network of Ocean Researchers for Fisheries (BOB-NOR) भी क्षेत्रीय स्तर पर डेटा शेयरिंग को मजबूती देगा। जो कंपनियां सैटेलाइट और AI आधारित अडैप्टिव मैनेजमेंट को अपना रही हैं, वे भविष्य में क्लाइमेट से जुड़ी सप्लाई चेन की उठापटक को बेहतर ढंग से हैंडल कर पाएंगी।
