मई 2023 से मणिपुर में चल रहा जातीय संघर्ष अब आर्थिक मोर्चे पर भी चिंता का सबब बन गया है। प्रेसिडेंट्स रूल के बीच, नार्थ-ईस्ट में चल रहे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स के समय पर पूरा होने को लेकर निवेशकों के मन में संशय बढ़ गया है।
आर्थिक और व्यापारिक मोर्चे पर दबाव
सितंबर 2026 तक की स्थिति के अनुसार, मणिपुर का जातीय संकट अब केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक चुनौती भी बन चुका है। अब तक करीब 260 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और 60,000 के करीब लोग विस्थापित हुए हैं। इसका सीधा असर वहां की लोकल इकोनॉमी, सप्लाई चेन और छोटे उद्योगों पर पड़ा है।
'Act East' पॉलिसी और इंफ्रा प्रोजेक्ट्स का गणित
इन्वेस्टमेंट के नजरिए से देखें तो भारत सरकार की 'Act East' पॉलिसी के तहत चल रहे प्रोजेक्ट्स के लिए यह संकट एक बड़ा 'हर्डल' बन गया है। इसमें Trans-Asian Railway और Trilateral Highway जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स शामिल हैं, जो सीधे तौर पर इस क्षेत्र की स्थिरता पर निर्भर करते हैं।
इन प्रोजेक्ट्स के लिए प्रमुख जोखिम:
- प्रोजेक्ट डिले: अशांति के कारण निर्माण कार्यों में देरी और डेडलाइन्स का बार-बार आगे बढ़ना।
- कॉस्ट ओवररन्स: अस्थिर माहौल के कारण प्रोजेक्ट की लागत का बढ़ना।
- निवेशकों की सतर्कता: निर्माण, इंजीनियरिंग और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के लिए काम करना मुश्किल हो रहा है, जिससे वे नए ऑर्डर्स लेने में सावधानी बरत रही हैं।
आगे का रास्ता
निवेशकों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण मॉनिटरेबल है—क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की बहाली और सरकार की ओर से प्रोजेक्ट टाइमलाइन पर दिए जाने वाले अपडेट्स। लंबे समय तक अस्थिरता रहने पर पड़ोसी राज्यों में भी इसका असर दिखने का खतरा बना हुआ है, जो मैन्युफैक्चरिंग और लॉन्ग-टर्म कैपिटल डिप्लॉयमेंट को प्रभावित कर सकता है।
