Maharashtra Charity Commissioner ने Tata Trusts को एक बड़ा झटका दिया है। ट्रस्ट के भीतर चल रहे इंटरनल विवाद और गवर्नेंस से जुड़ी शिकायतों पर **12 अक्टूबर, 2026** तक जवाब मांगा गया है।
विवाद की जड़ और कानूनी पेच
यह मामला ट्रस्ट के दो ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह द्वारा दायर की गई शिकायतों के बाद सामने आया है। इनका आरोप है कि संस्थान में गवर्नेंस की कमी है, फैसलों में पारदर्शिता नहीं है और कंपनी के कमर्शियल मामलों में गलत तरीके से दखलअंदाजी की जा रही है। यह विवाद ऐसे समय में आया है जब Tata Trusts के पास Tata Sons की 66% हिस्सेदारी है।
बोर्ड में खींचतान का असर
झगड़ा काफी गहरा है, जिसका असर कामकाज पर भी दिख रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 17 सितंबर, 2026 को N. Chandrasekaran को फिर से चेयरमैन बनाने के बोर्ड प्रस्ताव पर नोएल टाटा ने आपत्ति जताई थी। इसका असर इतना ज्यादा रहा कि 18 अगस्त, 2026 को हुई AGM में कोरम (Quorum) तक पूरा नहीं हो पाया।
निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?
निवेशकों की चिंता का कारण यह है कि Tata Sons को RBI की तरफ से 'कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी' के रजिस्ट्रेशन को सरेंडर करने की इजाजत नहीं मिली है। इसका मतलब है कि कंपनी को अब नियमों के पालन के लिए पब्लिक लिस्टिंग (IPO) पर विचार करना पड़ सकता है। लेकिन इस तरह के बड़े फैसलों के लिए एक स्थिर बोर्ड का होना अनिवार्य है।
फिलहाल, Tata Trusts ने खुद को बचाने के लिए 'कैविएट' दाखिल की है, ताकि उनकी बात सुने बिना कोई एकतरफा आदेश न दिया जाए। बाजार की नजरें अब 12 अक्टूबर की डेडलाइन पर टिकी हैं, क्योंकि इस पर आने वाला कोई भी रेगुलेटरी कमेंट कंपनी के मैनेजमेंट में बड़े बदलाव या अस्थिरता का संकेत हो सकता है।
