Luxury Watch Market: घड़ियों के कलेक्टरों का सवाल - क्या क्वालिटी से ज़्यादा है कीमत?

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AuthorAditya Rao|Published at:
Luxury Watch Market: घड़ियों के कलेक्टरों का सवाल - क्या क्वालिटी से ज़्यादा है कीमत?
Overview

लग्ज़री घड़ी बनाने वाली बड़ी कंपनियों के लिए बाज़ार में मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। खरीदार अब सवाल उठा रहे हैं कि आखिर क्यों रिटेल की कीमतें इतनी तेजी से बढ़ रही हैं, जबकि घड़ियों की क्वालिटी में कोई खास सुधार नहीं दिख रहा। यह स्थिति इस लग्ज़री सेक्टर में मांग पर असर डाल सकती है।

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वैल्यूएशन में बड़ा गैप

लग्ज़री ब्रांड्स को अब समझ आ रहा है कि पब्लिक रिटेल स्पेस में घड़ियों को बेचना मुश्किल हो रहा है। इसी वजह से वो फिलाडेल्फिया जैसे शहरों में मेन लाइन आर्मरी (Main Line Armory) जैसी जगहों पर प्राइवेट इवेंट्स कर रहे हैं। इन आयोजनों का मकसद ग्राहकों को खास महसूस कराना है, लेकिन यह तरकीब अनुभवी कलेक्टर्स के मन का संदेह दूर नहीं कर पा रही है। भले ही ग्राहक Girard-Perregaux Laureato जैसी घड़ियों को हाथ में लेकर उनकी बनावट की तारीफ करें, लेकिन अब चर्चा सिर्फ क्वालिटी की नहीं, बल्कि घड़ियों की वैल्यू घटने और बढ़ती कीमतों की हो रही है।

बाज़ार में गिरावट और कलेक्टर्स का नज़रिया

हाल ही में अमीर कलेक्टर्स के बीच हुई बातचीत से पता चला है कि वे ब्रांड्स की कीमत बढ़ाने की रणनीति से काफी परेशान हैं। ज़्यादातर लोगों का मानना है कि पिछले 5 सालों में घड़ी बनाने वाली कंपनियों ने रिटेल कीमतों को बेतहाशा बढ़ाया है, लेकिन घड़ियों की टेक्निकल क्वालिटी या फिनिशिंग में कोई खास इज़ाफ़ा नहीं किया है। यह ट्रेंड दिखाता है कि लग्ज़री सामानों का बाज़ार थोड़ा ठंडा पड़ रहा है। जैसे-जैसे नॉन-ब्लू-चिप मॉडल्स की रीसेल वैल्यू (Resale Value) कम हो रही है, कलेक्टर्स भी अब समझदारी से खरीददारी कर रहे हैं और हाइप (Hype) के बजाय वैल्यू पर ध्यान दे रहे हैं। कंपनियों का छोटे केस साइज (Case Size) की तरफ बढ़ना, असली सोच से ज़्यादा, सैचुरेटेड मार्केट में बिक्री बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

लग्ज़री होरोलॉजी की कमजोरी

लग्ज़री घड़ियों के लिए 'बेयर केस' (Bear Case) यानी गिरावट का तर्क यह है कि कंपनियों ने मैन्युफैक्चरर्स की स्टैंडर्ड प्राइस (MSRP) को हकीकत से कहीं ज़्यादा बढ़ा दिया है। पहले जहां कीमतों में बढ़ोतरी महंगाई या मटेरियल की कमी की वजह से होती थी, वहीं अब ये बढ़ोतरी सिर्फ ब्रांड की इमेज बनाने के लिए की जा रही है। यह एक नाजुक सिस्टम बना रहा है, जहां ब्रांड वैल्यू हमेशा बढ़ती रहने की उम्मीद पर टिकी है। अगर रीसेल मार्केट (Resale Market) में मंदी आती है, तो प्राइमरी मार्केट (Primary Market) को बड़ी दिक्कत होगी, क्योंकि डीलर्स उन घड़ियों को नहीं बेच पाएंगे जिनकी रीसेल वैल्यू कम हो गई है। साथ ही, प्राइवेट इवेंट्स पर निर्भरता बताती है कि ब्रांड्स नई पीढ़ी के युवा खरीदारों को बड़े पैमाने पर नहीं जोड़ पा रहे हैं और उन्हें पुराने, अमीर ग्राहकों पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है।

आगे का रास्ता

आने वाले समय में, लग्ज़री घड़ी सेक्टर में पावर कंज्यूमर (Consumer) यानी खरीदार के हाथ में जाता दिख रहा है। जो ब्रांड्स कीमत बढ़ाने के बजाय असली इनोवेशन (Innovation) पर ध्यान देंगे, वही इस मंदी के दौर से निकल पाएंगे। दूसरी ओर, जो ब्रांड्स आर्टिफिशियल स्कार्सिटी (Artificial Scarcity) और आक्रामक कीमतों पर निर्भर हैं, वे अपना प्रभाव खो सकते हैं, क्योंकि कलेक्टर्स नए मॉडल्स की खुशी मनाने के बजाय घड़ियों की असली वैल्यू का हिसाब-किताब करने लगेंगे।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.