WWF की 'Living Planet Report 2026' के मुताबिक **1970** के बाद से वैश्विक वन्यजीव आबादी में **73.2%** की कमी आई है। हालांकि, भारत में बाघ, गैंडे और एशियाई शेरों की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई है, जो निवेशकों के लिए पर्यावरण अनुपालन (Environmental Compliance) के नए मानक तय कर सकती है।
World Wide Fund और Zoological Society of London द्वारा जारी 'Living Planet Report 2026' जैव विविधता के मोर्चे पर एक बड़े खतरे का संकेत दे रही है। 5,790 प्रजातियों की 35,803 आबादी के विश्लेषण से पता चला है कि 1970 से 2022 के बीच वन्यजीवों की संख्या में 73.2% की गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, फ्रेशवॉटर सिस्टम में 85%, स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में 69% और समुद्री पर्यावरण में 59% की कमी आई है।
भारत की सफलता की कहानी
वैश्विक गिरावट के विपरीत, भारत इस मामले में अपवाद साबित हुआ है। देश में संरक्षण प्रयासों के चलते प्रमुख प्रजातियों की संख्या बढ़ी है। एक सींग वाले गैंडों की संख्या 3,300 के पार पहुंच गई है, जबकि एशियाई शेरों की आबादी 2020 के 674 से बढ़कर 2025 में 891 हो गई है। गंगा में डॉल्फिन की संख्या भी 6,324 दर्ज की गई है, जो वैज्ञानिक निगरानी की सफलता को दर्शाती है।
निवेशकों के लिए चेतावनी और चुनौतियां
भारत में संरक्षण की सफलता का दूसरा पहलू इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के लिए नई चुनौतियां हैं। सख्त होते Environmental Impact Assessment (EIA) नियमों के चलते अब बड़ी सड़क परियोजनाओं, माइनिंग और पावर प्लांट्स के लिए मंजूरी मिलना और कठिन हो सकता है। यदि प्रोजेक्ट किसी इको-सेंसिटिव जोन या वन्यजीव कॉरिडोर के पास है, तो कंपनियों को लागत बढ़ने और समय सीमा में देरी का सामना करना पड़ सकता है।
भविष्य की रणनीति
निवेशकों को अब ESG मानकों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। भविष्य में पर्यावरण नीतियां और सख्त हो सकती हैं, जिसका सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ेगा जो विकास और पर्यावरण संतुलन को साधने में पीछे रहती हैं। जो कंपनियां अपनी परिचालन योजना (Operational Plan) में संरक्षण रणनीतियों को पहले से शामिल कर रही हैं, उन्हें रेगुलेटरी क्लीयरेंस में कम मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
