देश भर में वामपंथी दलों ने Election Commission के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनका आरोप है कि 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' प्रक्रिया के जरिए देश भर से **13 करोड़** मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं।
देश की मुख्य वामपंथी पार्टियों, जिनमें Communist Party of India (Marxist) और Communist Party of India (CPI) शामिल हैं, ने Election Commission of India के कामकाज पर सवाल खड़े करते हुए विरोध प्रदर्शन तेज कर दिए हैं। यह विवाद मुख्य रूप से मतदाता सूची प्रबंधन को लेकर है।
मतदाता सूची को लेकर विवाद
विरोध का मुख्य कारण 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' प्रक्रिया है। विपक्षी नेताओं का दावा है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से दोषपूर्ण है, जिसके चलते देश भर में 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से गायब कर दिए गए हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि ये महज तकनीकी खामियां नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से एक बड़े वर्ग को बाहर करने की सोची-समझी साजिश है।
वामपंथी दलों की मुख्य मांगें
आंदोलन कर रहे दलों ने सरकार और चुनाव आयोग के सामने कई सख्त शर्तें रखी हैं। इनमें Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar के इस्तीफे की मांग सबसे ऊपर है। इसके अलावा, उन्होंने मौजूदा रिविजन एक्सरसाइज को तुरंत रोकने और हटाए गए नामों को बहाल करने की मांग की है। वे चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की पुरानी प्रणाली को फिर से बहाल करने पर भी जोर दे रहे हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के Chief Justice of India की भूमिका अनिवार्य थी।
चुनाव आयोग का पक्ष
दूसरी ओर, Election Commission ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। आयोग का कहना है कि उनकी सभी कार्रवाई वैधानिक नियमों के दायरे में रहकर की गई हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' से संबंधित हर फैसला तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिया गया है।
राजनीतिक संदर्भ
यह घटना पूरी तरह से राजनीतिक और प्रशासनिक है। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि इस घटनाक्रम का शेयर बाजार या किसी भी लिस्टेड कंपनी के कामकाज से कोई लेना-देना नहीं है। इसका फाइनेंशियल मार्केट पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
