मिड और स्मॉल-कैप शेयरों में उथल-पुथल के बीच निवेशक अब लार्ज-कैप स्टॉक्स की ओर रुख कर रहे हैं। सक्रिय IPO मार्केट की वजह से लिक्विडिटी पर असर पड़ने की आशंका के बीच, एक्सपर्ट्स इस फाइनेंशियल ईयर में कंपनियों की कमाई और पोर्टफोलियो को संतुलित रखने पर जोर दे रहे हैं।
लार्ज-कैप की ओर क्यों मुड़े निवेशक?
भारतीय शेयर बाजार में एक बड़ी स्ट्रैटेजिक शिफ्ट देखने को मिल रही है। निवेशक अब बड़े यानी लार्ज-कैप स्टॉक्स की ओर लौट रहे हैं। यह उस लंबे समय के ट्रेंड से बिल्कुल अलग है जब स्मॉल और मिड-कैप शेयरों में ज्यादा पैसा लगाया जा रहा था, लेकिन हाल ही में इन सेगमेंट्स में काफी गिरावट आई है। मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि छोटे सेगमेंट्स में वैल्यूएशन (Valuation) के बढ़ जाने के कारण, अब लार्ज-कैप कंपनियों को एक ज्यादा स्थिर विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।
कमाई और वैल्यूएशन का खेल
अब बाजार की चाल कंपनियों के प्रॉफिट (Profit) यानी कमाई पर टिकी हुई है। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि 2027 फाइनेंशियल ईयर तक कंपनियों की कमाई में मिड-टीन्स यानी 15% के आसपास की ग्रोथ देखने को मिल सकती है। यह आंकड़ा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कई सेक्टर्स में अभी से ही मार्केट वैल्यूएशन काफी ज्यादा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) में और ढील मिलने की उम्मीदें कम हैं, इसलिए निवेशक अब ब्याज दरों के फायदे की बजाय कंपनियों के बॉटम-लाइन परफॉर्मेंस पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
नए IPOs का असर
आने वाले महीनों में निवेशकों को IPO पाइपलाइन पर कड़ी नजर रखनी होगी। हालांकि, नए पब्लिक लिस्टिंग (Public Listing) आर्थिक ग्रोथ के लिए अच्छी हैं, लेकिन बड़ी संख्या में नए IPOs आने से पुरानी, स्थापित कंपनियों से लिक्विडिटी (Liquidity) कम हो सकती है। अगर मार्केट में थोड़ी भी उथल-पुथल आती है, तो यह नए IPOs का दबाव मौजूदा स्टॉक्स पर भी पड़ सकता है। निवेशक इस बात पर गौर कर रहे हैं कि क्या नए IPOs की यह रफ्तार बनी रहेगी या यह बाजार की धारणा को प्रभावित करना शुरू कर देगी।
पोर्टफोलियो को कैसे करें संतुलित?
वेल्थ मैनेजर्स (Wealth Managers) का सुझाव है कि मौजूदा माहौल में अपने कैपिटल (Capital) को सुरक्षित रखने के लिए डायवर्सिफाइड (Diversified) यानी अलग-अलग जगह पैसा लगाना जरूरी है। अगले 12 से 18 महीनों के लिए, एक आम सलाह यह है कि इक्विटी (Equity) में करीब 40%, डेट (Debt) में 25% और अल्टरनेटिव्स (Alternatives) में 25% पैसा लगाया जाए। गोल्ड (Gold) और सिल्वर (Silver) को पोर्टफोलियो का अहम हिस्सा माना जा रहा है, जिन्हें मार्केट की अनिश्चितता से बचने के लिए अक्सर 10% का एलोकेशन दिया जाता है। इसके अलावा, ट्रेडिशनल फिक्स्ड-इनकम प्रोडक्ट्स (Fixed-Income Products) से हटकर रिटर्न पाने के लिए प्राइवेट क्रेडिट (Private Credit) और स्ट्रक्चर्ड डेट इंस्ट्रूमेंट्स (Structured Debt Instruments) में भी निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ रही है।
सेक्टर्स की प्रोडक्टिविटी और टेक्नोलॉजी
हालांकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ग्लोबल मार्केट का एक बड़ा थीम बना हुआ है, लेकिन भारतीय इंडस्ट्रीज पर इसका असर धीरे-धीरे दिखने की उम्मीद है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि AI सीधे तौर पर बड़े बदलावों की बजाय, समय के साथ विभिन्न सेक्टर्स में प्रोडक्टिविटी (Productivity) बढ़ाने में मदद करेगा। निवेशकों को यह देखना चाहिए कि लार्ज-कैप कंपनियां इन टेक्नोलॉजीज को कैसे अपनाकर अपने ऑपरेशनल मार्जिन (Operational Margins) को बेहतर बनाती हैं। वेल्थ मैनेजमेंट इंडस्ट्री (Wealth Management Industry) में भी बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव आ रहे हैं, जहां बढ़ती प्रतिस्पर्धा और पर्सनलाइज्ड एडवाइजरी (Personalized Advisory) की मांग को पूरा करने के लिए कंपनियां टेक्नोलॉजी पर अपना खर्च बढ़ा रही हैं।
