केंद्र सरकार के **15 अक्टूबर** के नए प्रस्ताव ने लद्दाख के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। मई **2026** में बनी आम सहमति से अलग इस ड्राफ्ट ने स्थानीय स्वायत्तता (Autonomy) और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी है, जिसका असर भविष्य के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर भी पड़ सकता है।
ड्राफ्ट में क्या बदला?
केंद्र सरकार द्वारा 15 अक्टूबर, 2026 को जारी प्रशासनिक ड्राफ्ट मई 2026 में हुए समझौते से काफी अलग है। शुरुआती चर्चाओं में लद्दाख को मजबूत कार्यकारी और विधायी शक्तियां देने की बात थी, लेकिन नए प्रस्ताव के तहत प्रस्तावित काउंसिल सीधे तौर पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित नियमों के अधीन होगी, न कि किसी विशेष संवैधानिक सुरक्षा के तहत।
प्रशासन बनाम स्थानीय अधिकार
विवाद का मुख्य बिंदु प्रशासनिक ढांचा है। नए ड्राफ्ट के मुताबिक, केंद्र द्वारा नियुक्त लेफ्टिनेंट गवर्नर के पास विधायी कार्यों पर मुहर लगाने की शक्ति बनी रहेगी। लेह और कारगिल के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह व्यवस्था स्थानीय नौकरशाही और निर्णय लेने की उनकी क्षमता को सीमित करती है। इसमें उन संवैधानिक सुरक्षा उपायों का अभाव है, जिसकी मांग स्थानीय निकाय लंबे समय से कर रहे हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश पर असर
निवेशकों और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए यह खबर अहम है। लद्दाख फिलहाल रोड कनेक्टिविटी, सुरंग निर्माण और पावर सेक्टर जैसे कई बड़े प्रोजेक्ट्स का केंद्र है। इन कैपिटल-इंटेंसिव प्रोजेक्ट्स के लिए लंबे समय तक स्थिरता और स्थानीय स्तर पर तालमेल अनिवार्य है। राजनीतिक असहमति बढ़ने से प्रोजेक्ट्स के निष्पादन (Execution) में देरी और पूंजी निवेश की गति पर नकारात्मक असर पड़ने का जोखिम बना हुआ है।
आगे की राह
बाजार और नीति विश्लेषकों की नजर अब लेह और कारगिल के संयुक्त मंच (Joint Forum) की प्रतिक्रिया पर है। सरकार इस ड्राफ्ट में क्या बदलाव करती है और काउंसिल की शक्तियां कितनी स्पष्ट होंगी, यह देखना भविष्य के लिए काफी महत्वपूर्ण होगा।
