Kumartuli Artisans: यूनेस्को की नजर इस कला पर, लेकिन कच्चे माल की किल्लत बड़ी चुनौती

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Kumartuli Artisans: यूनेस्को की नजर इस कला पर, लेकिन कच्चे माल की किल्लत बड़ी चुनौती

पश्चिम बंगाल सरकार कोलकाता के कुमारटोली जिले को यूनेस्को की विरासत सूची में शामिल कराने की कोशिश कर रही है, ताकि यहां की अनोखी मूर्ति बनाने की कला को बचाया जा सके। यह कदम दुर्गा पूजा को 2021 में मिली विरासत की मान्यता के बाद उठाया जा रहा है। हालांकि, कारीगरों को कच्चे माल की बढ़ती कीमतें, मिट्टी की अनियमित सप्लाई और युवा पीढ़ी के इस पेशे से दूर जाने जैसी बड़ी आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

यूनेस्को की विरासत की दौड़ में कुमारटोली

कोलकाता का कुमारटोली, जो सदियों से मूर्तिकला का गढ़ रहा है, अब पश्चिम बंगाल सरकार की कोशिशों से यूनेस्को की विरासत सूची में शामिल होने की कगार पर है। यह पहल 2021 में दुर्गा पूजा को मिली वैश्विक मान्यता के बाद की जा रही है। कुमारटोली के कारीगरों के लिए यह मान्यता इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार, संरक्षण के लिए फंडिंग और उनकी कला को लंबे समय तक बनाए रखने का एक जरिया बन सकती है।

पारंपरिक वर्कशॉप मॉडल के सामने चुनौतियां

कुमारटोली की मूर्तियों की दुनियाभर में तारीफ होती है, लेकिन यहां के कारीगरों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ज्यादातर वर्कशॉप तंग और पुरानी गलियों में हैं, जहां जगह की कमी है। इस इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के चलते कलाकार न तो प्रोडक्शन बढ़ा पा रहे हैं और न ही आधुनिक सुरक्षा और सफाई मानकों को अपना पा रहे हैं। इसके अलावा, जिले को जरूरी कच्चे माल की सप्लाई में भी लगातार दिक्कतें आ रही हैं। पर्यावरणीय नियमों के कारण नदी की मिट्टी का खनन मुश्किल हो गया है, जिससे सप्लाई में कमी आई है और कीमतें बढ़ी हैं। इसका सीधा असर इन मौसमी व्यवसायों के मुनाफे पर पड़ रहा है।

आर्थिक जोखिम और मजदूरों का भविष्य

कच्चे माल की समस्या के अलावा, कारीगरों की आय भी बहुत अनिश्चित है। मूर्ति बनाना काफी हद तक मौसमी काम है, जो बड़े त्योहारों से जुड़ा है। इस कारण, कई मजदूरों को लंबे समय तक कोई लगातार कमाई नहीं होती। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कारीगरों को अक्सर ग्राहकों से देर से या अधूरा भुगतान मिलता है, जिससे उनके लिए नकदी का संकट खड़ा हो जाता है। इस आर्थिक अनिश्चितता ने पीढ़ीगत दरार पैदा कर दी है। युवा पीढ़ी, अस्थिर कमाई और काम की मुश्किल परिस्थितियों के कारण, इस पारंपरिक कला से दूर जा रही है। यह बदलाव उन खास हुनर के हस्तांतरण को खतरे में डाल रहा है जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।

निवेशक और विरासत के मुद्दे

यूनेस्को की मान्यता की मांग इन संरचनात्मक दबावों को दूर करने का एक प्रयास है। अगर यह सफल होता है, तो वर्कशॉप के आधुनिकीकरण और ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए विशेष फंडिंग मिल सकती है, जिससे कला का आर्थिक भविष्य स्थिर हो सकता है। इस पहल पर नजर रखने वालों के लिए, मुख्य बातें सरकारी या अंतरराष्ट्रीय फंड का वास्तविक आवंटन, मिट्टी और बांस जैसे कच्चे माल के लिए सप्लाई चेन में सुधार, और जिले की वह क्षमता होगी जिससे वह बढ़े हुए टूरिज्म को इस तरह मैनेज कर सके कि उच्च गुणवत्ता वाली हस्तकला के उत्पादन की नाजुक प्रक्रियाएं बाधित न हों।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.