Special Parliament Session: खड़गे की मांग, डेलिमिटेशन पर बुलाई जाए ऑल-पार्टी मीटिंग

OTHER
Whalesbook Logo
AuthorAditi Chauhan|Published at:
Special Parliament Session: खड़गे की मांग, डेलिमिटेशन पर बुलाई जाए ऑल-पार्टी मीटिंग

कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge ने प्रधानमंत्री Narendra Modi को पत्र लिखकर संसद के संभावित स्पेशल सेशन पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju के बयानों के बाद मचे इस सियासी घमासान से बाजार में पॉलिसी अनिश्चितता का खतरा बढ़ गया है।

कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर संसद के एक संभावित स्पेशल सेशन के एजेंडे पर चर्चा करने की मांग की है। यह घटनाक्रम संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju की उन टिप्पणियों के बाद सामने आया है, जिनमें उन्होंने सदन को फिर से बुलाने की संभावना जताई थी। बता दें कि अगस्त 2026 में संपन्न हुआ मॉनसून सत्र 'एडजर्न साइन डाई' (adjourned sine die) हुआ था, न कि प्रोरोग, जिससे सरकार के लिए नए सत्र को बुलाने का रास्ता खुला हुआ है।

डेलिमिटेशन और पॉलिसी अनिश्चितता

विवाद की जड़ डेलिमिटेशन (परिसीमन) की प्रक्रिया है, जिसमें चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय किया जाना है। Mallikarjun Kharge ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा है कि ऐसा कोई भी कदम उठाने से पहले व्यापक राजनीतिक चर्चा जरूरी है। विपक्ष ने मांग की है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को अगले 25 सालों के लिए फ्रीज किया जाए और महिलाओं के लिए 1/3 आरक्षण को 2029 के चुनावी चक्र में लागू किया जाए।

बाजार और निवेशकों के लिए विधायी स्थिरता (Legislative Stability) सबसे अहम है। अप्रैल 2026 में सरकार को उस वक्त झटका लगा था जब Constitution (131st Amendment) Bill लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में विफल रहा था। जब भी महत्वपूर्ण संवैधानिक बदलावों के मामले में विधायी प्रक्रिया रुकती है, तो यह गहराते सियासी मतभेदों का संकेत देता है, जिससे अन्य सुधारों में देरी हो सकती है।

विधायी जोखिमों पर निवेशकों की नजर

फिलहाल, संघीय प्रतिनिधित्व को लेकर पॉलिसी का रुख साफ नहीं है। निवेशक संसद सत्रों पर इसलिए बारीकी से नजर रखते हैं क्योंकि इन्हीं सत्रों से आर्थिक और ढांचागत सुधारों की गति तय होती है। यदि सरकार बिना आम सहमति के कोई स्पेशल सेशन बुलाती है, तो इससे संसदीय व्यवधान बढ़ सकता है। ऐसी अस्थिरता से शॉर्ट-टर्म मार्केट में घबराहट पैदा होती है, क्योंकि निवेशकों को प्रमुख विधेयकों के अटकने का डर सताता है।

फिलहाल सरकार की तरफ से सर्वदलीय बैठक पर कोई औपचारिक जवाब नहीं आया है। अब बाजार इस बात पर नजर रखेगा कि क्या सरकार और विपक्ष के बीच सहमति बनती है, जिससे राजनीतिक जोखिम कम हो सके, या फिर गतिरोध बना रहता है जिससे आने वाले महीनों में पॉलिसी को लेकर अनिश्चितता बनी रहे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.