केरल के जल संसाधन मंत्री मॉन्स जोसेफ ने मुल्लापेरियार बांध में जल स्तर बढ़ाने की तमिलनाडु की योजना का कड़ा विरोध किया है। **131 साल** पुरानी इस संरचना की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए, राज्य ने सुप्रीम कोर्ट जाने की धमकी दी है। उनका कहना है कि सुरक्षा निरीक्षण और मजबूती के ज़रूरी काम अभी अधूरे हैं।
क्या है पूरा मामला?
केरल और तमिलनाडु के बीच मुल्लापेरियार बांध को लेकर पुराना विवाद एक बार फिर गरमा गया है। हाल ही में तमिलनाडु के बजट में की गई घोषणाओं के बाद केरल के जल संसाधन मंत्री, मॉन्स जोसेफ ने बांध में जल स्तर बढ़ाने की किसी भी योजना का सार्वजनिक रूप से विरोध किया है। केरल का साफ कहना है कि बांध में पानी का स्तर 142 फीट से ज़्यादा नहीं बढ़ना चाहिए।
क्यों है विवाद?
मंत्री जोसेफ ने कहा कि अगर तमिलनाडु एकतरफा तरीके से पानी का स्तर बढ़ाता है, तो केरल सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगा। राज्य सरकार की चिंता 131 साल पुराने इस गुरुत्वाकर्षण बांध की सुरक्षा को लेकर है। यह बांध केरल के इडुक्की में स्थित है, लेकिन इसका संचालन तमिलनाडु सरकार करती है।
विवाद की जड़ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले जारी किए गए सुरक्षा निर्देशों का पालन न होना है। केरल का आरोप है कि 'बेबी डैम' को मजबूत करने और ज़रूरी सुरक्षा जांच जैसे महत्वपूर्ण काम अभी तक पूरे नहीं हुए हैं। केरल ने यह भी बताया कि राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (National Dam Safety Authority) से 31 दिसंबर से पहले एक व्यापक सुरक्षा मूल्यांकन शुरू करने का अनुरोध किया गया था, लेकिन यह अभी तक शुरू नहीं हुआ है। केरल के मुताबिक, सुरक्षा व्यवस्था में इन कमियों के चलते पानी का दबाव बढ़ाना जोखिम भरा हो सकता है।
नए बांध की मांग
पानी के स्तर के मौजूदा विवाद से परे, केरल लगातार एक नए बांध के निर्माण की वकालत कर रहा है। राज्य का मानना है कि लंबी अवधि की सुरक्षा के जोखिमों को दूर करने के लिए एक नई संरचना आवश्यक है, साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि तमिलनाडु को उसका आवंटित पानी मिलता रहे। यह स्थिति साझा जल संसाधनों के प्रबंधन की जटिलताओं को उजागर करती है, जहाँ पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर की उम्र और पर्यावरण सुरक्षा अंतर-राज्यीय राजनीतिक हितों से टकराती है।
क्षेत्रीय विकास पर नज़र रखने वालों के लिए, यह निरंतर तनाव भारत में पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी चुनौतियों की याद दिलाता है। हालाँकि यह मुख्य रूप से एक अंतर-राज्यीय कानूनी और सुरक्षा मामला है, न कि कोई कॉर्पोरेट घटना, यह विवाद एक महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दा बना हुआ है। आने वाले महीनों में मुख्य ध्यान इस बात पर रहेगा कि क्या अनुरोधित सुरक्षा निरीक्षण किए जाते हैं और यदि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचता है तो वहां से क्या प्रतिक्रिया आती है। इन सुरक्षा उपायों में किसी भी देरी या बांध के प्रबंधन में बदलाव से दोनों राज्यों के बीच और अधिक राजनीतिक और कानूनी टकराव हो सकता है।
