केरल HC का बड़ा फैसला: महिलाओं-ट्रांसजेंडर के लिए फ्री बस यात्रा जारी, राज्य को ₹800 करोड़ का सालाना बोझ

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
केरल HC का बड़ा फैसला: महिलाओं-ट्रांसजेंडर के लिए फ्री बस यात्रा जारी, राज्य को ₹800 करोड़ का सालाना बोझ

केरल हाई कोर्ट ने 'प्रियदर्शनी स्कीम' के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी है। इस फैसले के बाद अब राज्य की महिलाओं और ट्रांसजेंडर यात्रियों को KSRTC की बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलती रहेगी। हालांकि, इस स्कीम पर राज्य सरकार पर हर साल करीब ₹800 करोड़ का भारी-भरकम खर्च आएगा।

कोर्ट ने क्या कहा?

केरल हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस सौमेन सेन और जस्टिस श्याम कुमार VM शामिल थे, ने राज्य सरकार की 'प्रियदर्शनी स्कीम' के पक्ष में अपना फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस स्कीम को रद्द करने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकार के इस फैसले को गलत या मनमाना नहीं ठहराया जा सकता और इसे रद्द करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।

स्कीम का वित्तीय बोझ

इस स्कीम के लागू होने से राज्य सरकार के खजाने पर हर दिन लगभग ₹2 करोड़ का खर्च आएगा। इस तरह, पूरे साल का हिसाब लगाया जाए तो यह आंकड़ा करीब ₹800 करोड़ तक पहुंच जाता है। यह खर्च केरल स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (KSRTC) पर पहले से मौजूद वित्तीय बोझ को और बढ़ाएगा। KSRTC को केरल सरकार से सालाना करीब ₹1,500 करोड़ की मदद मिलती है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इतनी बड़ी राशि खर्च करने के लिए सरकार को ठोस वजह बतानी चाहिए, खासकर तब जब इस सुविधा के लिए कोई आय सीमा (income criteria) तय नहीं की गई है। याचिका में यह भी कहा गया था कि सरकार ने इस स्कीम को लागू करने से पहले कोई विस्तृत नीति या वित्तीय विश्लेषण नहीं किया था।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट और वित्तीय स्थिरता

राज्य सरकारों के वित्तीय हालातों पर नज़र रखने वाले लोगों के लिए, KSRTC का सरकारी मदद पर निर्भर रहना एक अहम मुद्दा है। भारत में कई सरकारी बस कंपनियां संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रही हैं, जैसे कि परिचालन लागत का अधिक होना, पुरानी बसों का बेड़ा और मुनाफे में बने रहने की चुनौती।

जब सरकारें मुफ्त यात्रा जैसी सार्वजनिक सब्सिडी योजनाएं शुरू करती हैं, तो इसका वित्तीय दबाव यात्रियों से हटकर सीधे राज्य के बजट पर आ जाता है। 'प्रियदर्शनी स्कीम' कई भारतीय राज्यों में चल रही ऐसी ही सार्वजनिक परिवहन सब्सिडी योजनाओं की सूची में शामिल हो गई है। ये पहलें सामाजिक कल्याण और आवागमन को बेहतर बनाने के लिए होती हैं, लेकिन इनके लिए लगातार बजट आवंटन की जरूरत होती है। यदि KSRTC का परिचालन घाटा बढ़ता है, तो राज्य सरकार को सेवाओं को चालू रखने के लिए अपनी वार्षिक वित्तीय सहायता बढ़ानी पड़ सकती है।

कानूनी और नीतिगत पहलू

सरकार ने इस पहल का बचाव करते हुए कहा कि सार्वजनिक परिवहन में लिंग-आधारित सकारात्मक कार्रवाई (gender-based affirmative action) के पुराने कानूनी फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट का यह फैसला सार्वजनिक कल्याण-उन्मुख नीतियों को लागू करने की राज्य की शक्ति पर जोर देता है। अब कानूनी बाधा दूर होने के बाद, सवाल यह है कि राज्य के अन्य विकास परियोजनाओं के साथ-साथ इस कल्याणकारी योजना के वित्तपोषण की दीर्घकालिक स्थिरता कैसे सुनिश्चित की जाएगी।

आगे क्या?

इस मामले में आगे की मुख्य बातें केरल के राज्य बजट और आने वाली तिमाहियों में KSRTC के वित्तीय नतीजों पर पड़ने वाले असर पर होंगी। निवेशक और अन्य हितधारक यह देखेंगे कि क्या राज्य सरकार इन परिचालन लागतों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त धन आवंटित करती है, या KSRTC अपनी सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए किराए के अलावा अन्य स्रोतों से आय बढ़ाने के कदम उठाती है।

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