जम्मू के जगती टाउनशिप में विस्थापित कश्मीरी पंडितों ने राजनीतिक दलों के खिलाफ अपना गुस्सा ज़ाहिर किया है। उनका आरोप है कि उनकी समस्याओं को सिर्फ चुनावी मुद्दा बनाया जाता है, लेकिन असल में पुनर्वास और ज़रूरी सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं किया गया है। समुदाय अब चुनाव के बाद होने वाली उपेक्षा को खत्म कर, अपनी गरिमा और प्रतिनिधित्व की मांग कर रहा है।
क्या है पूरा मामला?
जम्मू में रह रहे विस्थापित कश्मीरी पंडित, खासकर जगती टाउनशिप के आसपास के लोगों ने मौजूदा राजनीतिक माहौल के खिलाफ अपना रोष व्यक्त करने के लिए प्रदर्शन किया है। ये लोग 1990 के दशक में आतंकवाद के कारण कश्मीर घाटी छोड़ने पर मज़बूर हुए थे। अब खुद को "राजनीतिक अनाथ" और "नए अछूत" बताते हुए, उनका कहना है कि उनकी दुर्दशा को चुनाव के दौरान ही याद किया जाता है, जबकि बाकी समय उन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता है।
सुविधाओं का अभाव और वादों का खोखलापन
निवासियों ने गंभीर सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर प्रगति की लगातार कमी पर चिंता जताई है। इसमें उनके टाउनशिप में नागरिक सुविधाओं का बिगड़ता हाल और किसी भी तरह के सार्थक राजनीतिक प्रतिनिधित्व का न होना शामिल है। समुदाय के लिए, एक सम्मानजनक जीवन की ओर वापसी और पुनर्वास का वादा अब तक अधूरा ही है। समुदाय के समर्थक बताते हैं कि उनके मुद्दों को सिर्फ चुनाव के समय के एजेंडे के तौर पर देखा जाता है, न कि सरकार की प्राथमिकता के रूप में। इस वजह से, मुख्यधारा की राजनीति में वे खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं।
चुनावी दांव-पेंच और हताशा
"इस्तेमाल" होने की भावना काफी आम है। समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि चुनाव घोषणापत्रों में भले ही उनके समुदाय का ज़िक्र हो, लेकिन उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कोई ठोस और लगातार नीतिगत कार्रवाई नहीं होती। इस कमी को देखते हुए, अब संवैधानिक गारंटी की मांग की जा रही है ताकि उनके अधिकारों की रक्षा हो सके और भविष्य सुरक्षित हो सके, ताकि बार-बारAttention के बाद उन्हें नज़रअंदाज़ न किया जाए।
2024 चुनावों का संदर्भ
हाल के चुनावी आंकड़े इन शिकायतों को और भी स्पष्ट करते हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए प्रवासी मतदाताओं का कश्मीर घाटी में रजिस्ट्रेशन पैटर्न बदला है। लेकिन, यह बदलाव भी विवादों में घिर गया है। कुछ समुदाय नेताओं का आरोप है कि कुछ राजनीतिक दल मतदाताओं पर दबाव डाल रहे हैं कि वे अपना रजिस्ट्रेशन वापस घाटी में कराएं। समुदाय इसे उन्हें एकीकृत करने की असली कोशिश के बजाय, राजनीतिक अलगाव की एक और परत के रूप में देख रहा है।
आगे क्या?
जैसे-जैसे समुदाय क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं में अपनी स्थायी जगह की मांग कर रहा है, मुख्य सवाल यही है कि राजनीतिक दल इन लंबे समय से चली आ रही प्रतिनिधित्व और पुनर्वास की मांगों पर कब और कैसे प्रतिक्रिया देंगे। इस समुदाय का लगातार अलग-थलग महसूस करना एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौती बना हुआ है, जिस पर स्थानीय हितधारक और विश्लेषक बारीकी से नज़र रख रहे हैं। किसी भी क्षेत्र में दीर्घकालिक स्थिरता को अक्सर सभी विस्थापित आबादी के शामिल होने और सक्रिय भागीदारी के बिना अधूरा माना जाता है।
