कर्नाटक सरकार ने Mekedatu प्रोजेक्ट के लिए रिवाइज्ड प्रपोजल जमा किया है। **₹16,745 करोड़** की इस परियोजना को तमिलनाडु के साथ पानी के बंटवारे को लेकर भारी कानूनी और रेगुलेटरी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
कर्नाटक सरकार ने 'मेकेदातु बैलेंसिंग रिजर्वायर' और हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के लिए अपनी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) सेंट्रल वॉटर कमीशन को फिर से सौंप दी है। इस नए प्रपोजल में प्रोजेक्ट की लागत ₹16,745 करोड़ आंकी गई है और इसमें 67.16 TMC की जल भंडारण क्षमता शामिल है। बेंगलुरु को पीने का पानी देने और बिजली पैदा करने के उद्देश्य से शुरू की गई यह परियोजना अब कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद का केंद्र बन गई है।
विवाद की मुख्य वजह क्या है?
तमिलनाडु ने इस प्रोजेक्ट पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि यह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal) के समझौतों का उल्लंघन है। राज्य ने कानूनी मंचों पर चिंता जताई है कि इस रिजर्वायर के कारण पानी के बहाव पर कर्नाटक का नियंत्रण बढ़ जाएगा, जिससे मानसून की कमी के दौरान निचले इलाकों की खेती पर बुरा असर पड़ सकता है।
रेगुलेटरी चुनौतियां
सेंट्रल वॉटर कमीशन पहले भी इस प्रस्ताव को वापस लौटा चुका है, क्योंकि इसमें 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अनुपालन नहीं था। प्रोजेक्ट को अभी भी तकनीकी और पर्यावरणीय जांच के कई चरणों से गुजरना बाकी है। यह मामला दिखाता है कि भारत में बड़े अंतर-राज्यीय इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को राजनीतिक और कानूनी विवादों के कारण कितनी देरी का सामना करना पड़ता है।
यह प्रोजेक्ट Cauvery Neeravari Nigam Limited द्वारा मैनेज किया जा रहा है। फिलहाल इसके भविष्य का दारोमदार सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और केंद्र सरकार की टिप्पणियों पर टिका है, जिसके कारण निर्माण कार्य की समय-सीमा अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।
