कर्नाटक में प्री-स्कूल संचालकों के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। राज्य सरकार के नए नियमों के कारण **25,000** प्री-स्कूल बंद होने की कगार पर हैं, जिससे **4.5 लाख** नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है और बच्चों की फीस **5 गुना** तक बढ़ सकती है।
नियमों का पेंच और इंफ्रास्ट्रक्चर की मार
कर्नाटक काउंसिल ऑफ प्री-स्कूल (KCPS) ने चेतावनी दी है कि K-12 स्कूलों के लिए बने कड़े नियमों को छोटे प्री-स्कूलों पर थोपना एक बड़ी गलती है। फिलहाल स्कूलों को 30 साल की रेंटल लीज, कम से कम 2,000 वर्ग फीट की जगह और 18x20 फीट के क्लासरूम जैसे मानकों को पूरा करने का दबाव बनाया जा रहा है। साथ ही, लैंड-यूज़ कन्वर्जन की प्रक्रिया छोटे ऑपरेटरों के लिए नामुमकिन सी हो गई है।
आर्थिक झटके का डर
इस फैसले से केवल छोटे स्कूल बंद नहीं होंगे, बल्कि यह सेक्टर के पूरे इकोनॉमिक स्ट्रक्चर को हिलाकर रख देगा। KCPS का अनुमान है कि इससे करीब 4.5 लाख महिलाओं की आजीविका प्रभावित होगी।
सबसे बड़ा डर 'मोनोपोली' का है। अगर छोटे और किफायती स्कूल बंद हुए, तो मार्केट में कंपटीशन खत्म हो जाएगा। इसका सीधा असर माता-पिता की जेब पर पड़ेगा और स्कूलों की फीस में 5 गुना तक की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है, जिससे मिडिल क्लास के लिए अपने बच्चों को पढ़ाना मुश्किल हो जाएगा।
सरकार से क्या मांग है?
काउंसिल ने राज्य सरकार से मांग की है कि वह ECCE (अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन) सेक्टर के लिए अलग और प्रैक्टिकल फ्रेमवर्क तैयार करे। फिलहाल, प्री-स्कूलों की मांग है कि मौजूदा बिल्डिंग और लैंड-यूज़ नियमों पर तत्काल रोक लगाई जाए और रजिस्ट्रेशन प्रोसेस को सरल बनाया जाए, जो अभी केवल Block Education Officer दफ्तरों तक ही सीमित है।
