कर्नाटक के डिप्टी सीएम DK Shivakumar ने प्रस्तावित लोक सभा डिलिमिटेशन (Delimitation) योजना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनका तर्क है कि जनसंख्या आधारित सीटों का बँटवारा दक्षिण भारतीय राज्यों के साथ अन्यायपूर्ण है, जो भविष्य में राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता के लिए अहम है।
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री DK Shivakumar ने लोकसभा क्षेत्रों के प्रस्तावित पुनर्गठन (Delimitation) पर तीखी आपत्ति जताई है। 26 अगस्त 2026 को आयोजित 'इंडिया टुडे कर्नाटक राउंडटेबल' में उन्होंने साफ कहा कि संसदीय प्रतिनिधित्व को केवल जनसंख्या वृद्धि से जोड़ना उन दक्षिणी राज्यों के लिए नुकसानदेह है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन के सफल कदम उठाए हैं।\n\n### पुरानी जनगणना पर जोर\nइससे पहले 20 अगस्त 2026 को 31वीं 'सदर्न जोनल काउंसिल' की बैठक में भी उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया था कि भविष्य की किसी भी डिलिमिटेशन प्रक्रिया के लिए 1971 की जनगणना को ही आधार बनाया जाए। उनका सुझाव है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को अगले 25 वर्षों तक फ्रीज (Freeze) रखा जाए और महिला आरक्षण को इसी मौजूदा संख्या के दायरे में लागू किया जाए।\n\n### निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?\nकारोबारी और आर्थिक नजरिए से देखें तो केंद्र और राज्यों के बीच के संबंध काफी मायने रखते हैं। यह विवाद न केवल नीतिगत निरंतरता (Policy Consistency) को प्रभावित करता है, बल्कि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (Infrastructure Projects) और टैक्स रेवेन्यू के बंटवारे जैसे अहम मुद्दों पर भी असर डाल सकता है। दक्षिण भारत के राज्य देश के बड़े इकोनॉमिक और टेक्नोलॉजी हब हैं, ऐसे में वहां के नेतृत्व की चिंताएं एक बड़े स्ट्रक्चरल तनाव की ओर इशारा करती हैं।\n\n### मार्केट और रिस्क फैक्टर्स\nफिलहाल, इस राजनीतिक घर्षण का शेयर बाजार पर कोई सीधा असर नहीं दिख रहा है, लेकिन यह एक 'मैक्रो-पॉलिटिकल मॉनिटरेबल' इवेंट जरूर है। यदि यह विवाद लंबा खिंचता है, तो बड़े विधायी एजेंडों में देरी हो सकती है, जो लॉन्ग-टर्म पॉलिसी प्लानिंग के लिए अनिश्चितता का माहौल पैदा कर सकता है। निवेशकों की नजर इस पर होगी कि क्या केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर ऐसा समाधान निकाल पाती हैं जो दक्षिणी राज्यों की जनसांख्यिकीय उपलब्धियों का सम्मान भी करे और राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व की जरूरतों को भी पूरा करे।
