Cauvery Water Management Authority (CWMA) के आदेश के खिलाफ कर्नाटक सरकार सुप्रीम कोर्ट का रुख कर रही है। राज्य सरकार का कहना है कि जलाशयों में पानी का स्तर बहुत कम है, इसलिए हर दिन **6,000 क्यूसेक** पानी तमिलनाडु छोड़ना संभव नहीं है।
कर्नाटक सरकार ने Cauvery Water Management Authority (CWMA) के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है, जिसमें राज्य को अगले 15 दिनों तक तमिलनाडु के लिए प्रतिदिन 6,000 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिया गया था। यह आदेश 9 सितंबर, 2026 से प्रभावी हुआ है।
जल संसाधन मंत्री एन. चेलुवरायस्वामी ने साफ किया है कि राज्य के जलाशयों में पानी का लेवल बेहद चिंताजनक स्थिति में है। सरकार का तर्क है कि पीने के पानी की जरूरत और स्थानीय झीलों को भरने की प्राथमिकता को देखते हुए पानी छोड़ना उनके लिए संभव नहीं है। इस कानूनी लड़ाई के साथ-साथ, सरकार Cauvery Water Regulation Committee (CWRC) के पास भी एक रिव्यू पिटीशन दायर करने की तैयारी कर रही है।
इकोनॉमिक और इंडस्ट्रियल इम्पैक्ट
इस जल विवाद का असर सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर भी गहरा है। कावेरी बेसिन धान और गन्ने की खेती का मुख्य केंद्र है। पानी की कमी का सीधा असर एग्री-बिजनेस की सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।
इसके अलावा, इस क्षेत्र में काम करने वाली वाटर-इंटेंसिव इंडस्ट्रीज जैसे मैन्युफैक्चरिंग, टेक्सटाइल और बेवरेज कंपनियां भी रिस्क में हैं। यदि पानी का संकट और गहराता है, तो स्थानीय प्रशासन औद्योगिक सप्लाई में कटौती कर सकता है या पानी की लागत बढ़ सकती है। ऐसे में जो कंपनियां कर्नाटक-तमिलनाडु कॉरिडोर में बड़े पैमाने पर काम कर रही हैं, उनके शेयरों पर नजर रखने की जरूरत है।
आगे क्या है रिस्क?
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा संकेत जलाशयों का जलस्तर और बारिश के आंकड़े हैं। फिलहाल कर्नाटक सरकार की राहत आने वाले दिनों में बारिश पर निर्भर है। भविष्य में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, CWRC की प्रतिक्रिया और औद्योगिक पानी की राशनिंग की किसी भी आधिकारिक सूचना पर निवेशकों को बारीकी से नजर रखनी चाहिए।
