कर्नाटक में कांग्रेस सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार हो गया है। अब कुल **33** मंत्री हैं, लेकिन इस विस्तार के बाद पार्टी में भारी असंतोष देखने को मिल रहा है। सबसे हैरानी की बात यह है कि मंत्रिमंडल में एक भी महिला को जगह नहीं मिली है।
मंत्रिमंडल में 19 नए चेहरे शामिल
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करते हुए 19 नए मंत्रियों को शपथ दिलाई है। इसके साथ ही अब राज्य मंत्रिमंडल में कुल सदस्यों की संख्या बढ़कर 33 हो गई है। यह विस्तार दिल्ली में पार्टी आलाकमान के साथ कई दौर की लंबी बातचीत के बाद हुआ है। इसका मकसद राज्य में क्षेत्रीय, जातीय और गुटीय संतुलन बनाना था।
असंतोष और आखिरी मिनट के बदलाव
हालांकि, इस विस्तार के तुरंत बाद पार्टी के भीतर से नाराजगी की खबरें आने लगी हैं। शपथ ग्रहण समारोह में आखिरी समय पर बदलाव किए गए, जिससे थोड़ी अफरातफरी मच गई। एक महिला उम्मीदवार, जिनके मंत्री बनने की उम्मीद थी, उन्हें भी शपथ नहीं दिलाई गई। इस वजह से मौजूदा मंत्रिपरिषद में एक भी महिला सदस्य शामिल नहीं है।
नाराज विधायकों का विरोध
राज्य के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो गए हैं। मैसूरु के तंवर सईद और सागर के बेलूर गोपालकृष्ण जैसे उन विधायकों के समर्थकों ने नाराजगी जताई है जिन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। इंडी विधानसभा क्षेत्र से विधायक यशवंतरया गौड़ा पाटिल ने तो विधायक पद से इस्तीफा देने तक की पेशकश कर दी है, जो पार्टी के अंदर बढ़ते असंतोष को दर्शाता है।
सिद्धारमैया गुट को फायदा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नए मंत्रिमंडल में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के गुट को ज्यादा तरजीह मिली है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भले ही पार्टी के असंतुष्ट सदस्यों से धैर्य रखने को कहा है और भविष्य में मौके देने का आश्वासन दिया हो, लेकिन राजनीतिक समीकरण अभी भी काफी जटिल नजर आ रहे हैं।
विपक्ष का हमला
विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस विस्तार को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। भाजपा ने खासकर महिला मंत्रियों की अनुपस्थिति पर सवाल उठाया है और इसे कांग्रेस के महिला सशक्तिकरण के दावों के विपरीत बताया है। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया है कि मंत्रियों के चयन में योग्यता से ज्यादा पैसों का खेल चला है, हालांकि ये केवल आरोप हैं।
यह मंत्रिमंडल विस्तार राज्य सरकार के लिए एक अहम पड़ाव है। निवेशक और जानकार आने वाले महीनों में देखेंगे कि सरकार इस आंतरिक कलह को कैसे संभालती है। पार्टी की एकजुटता बनाए रखना नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन और प्रशासनिक स्थिरता के लिए बहुत जरूरी है। यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन नेतृत्वीय दरारों के बावजूद अपनी विधायी एजेंडा को कैसे आगे बढ़ा पाती है।
