जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा (Statehood) बहाल करने के प्रस्ताव को लेकर सत्ताधारी गठबंधन और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ गया है। इस सियासी गतिरोध के कारण विधानसभा में कामकाज ठप है, जिसे लेकर निवेशक अब पॉलिसी की स्थिरता और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की रफ्तार को लेकर चिंतित हैं।
जम्मू-कश्मीर में फिलहाल नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच तीखी रस्साकशी देखने को मिल रही है। राज्य के पूर्ण दर्जे की बहाली को लेकर लाए गए प्रस्ताव पर दोनों पक्ष आमने-सामने हैं। इस विवाद का असर सीधे तौर पर विधानसभा की कार्यवाही पर पड़ा है, जिससे विधायी कामकाज बार-बार बाधित हो रहा है।\n\nनिवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सियासी गतिरोध प्रशासनिक फैसलों को धीमा कर देगा। जम्मू-कश्मीर की इकोनॉमी मुख्य रूप से टूरिज्म, बागवानी और इंफ्रास्ट्रक्चर पर टिकी है, जहां काम सुचारू रूप से चलने के लिए गवर्नेंस में निरंतरता बहुत जरूरी है। डिप्टी सीएम सुरेंद्र चौधरी और बीजेपी विधायकों के बीच जुबानी जंग ने अनिश्चितता का माहौल और गहरा कर दिया है।\n\nजब विधानसभा में डेडलॉक होता है, तो स्टेट-लेवल के डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स और बजट अप्रूवल की प्रक्रिया पर सीधा असर पड़ने का खतरा रहता है। निवेशकों को हमेशा एक ऐसे माहौल की तलाश होती है जहां पॉलिसी का रास्ता साफ हो, ताकि पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में निवेश की बेहतर प्लानिंग की जा सके। फिलहाल बाजार की नजर इस पर है कि क्या दोनों पक्ष बातचीत के लिए तैयार होंगे या गतिरोध और लंबा खिंचेगा। आने वाले दिनों में बजट की मंजूरी और स्टेटहुड की टाइमलाइन ही राज्य के बिजनेस क्लाइमेट की दिशा तय करेगी।
