जम्मू और कश्मीर से होने वाले हैंडीक्राफ्ट एक्सपोर्ट ने वित्त वर्ष 2025-26 में ₹817.39 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है। यह क्षेत्र 4.6 लाख से ज़्यादा रजिस्टर्ड कारीगरों का सहारा है। लेकिन, हकीकत थोड़ी अलग है, क्योंकि कारीगरों की दैनिक मज़दूरी सालों से वहीं अटकी हुई है, वहीं कच्चा माल महंगा हो रहा है और मशीन से बने सस्ते सामानों से कड़ी टक्कर मिल रही है। यह स्थिति इस पारंपरिक हस्तशिल्प उद्योग के भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर रही है।
एक्सपोर्ट में उछाल, पर कारीगरों की जेब खाली?
जम्मू और कश्मीर के हस्तशिल्प निर्यात (Handicraft Exports) ने वित्त वर्ष 2025-26 में ₹817.39 करोड़ का ज़बरदस्त प्रदर्शन किया है। यह रफ़्तार थमी नहीं है, चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भी ₹73.85 करोड़ का एक्सपोर्ट दर्ज किया गया है। वहीं, कारीगरों और बुनकरों के रजिस्ट्रेशन में भी इज़ाफ़ा हुआ है, करीब 13,000 नए रजिस्ट्रेशन के साथ अब कुल 4.61 लाख से ज़्यादा लोग इस क्षेत्र से जुड़े हैं।
कारीगरों की कमाई पर मार
एक्सपोर्ट के आंकड़ों में भले ही ज़बरदस्त उछाल दिख रहा हो, लेकिन असल कारीगरों की आर्थिक हालत कुछ और बयां करती है। कई कारीगर बताते हैं कि उनकी दैनिक कमाई, जो अक्सर ₹500 से ₹600 के बीच रहती है, सालों से बढ़ी ही नहीं है। ऊपर से कच्चे माल, जैसे कि अच्छी क्वालिटी के कपड़े और धागे की कीमतें भी आसमान छू रही हैं। खासकर कनी शॉल (Kani Shawls) और हाथ से बुने हुए कारपेट (Hand-knotted carpets) जैसे कामों में महीनों या सालों की मेहनत लगती है, और इतनी कम दैनिक मज़दूरी में परिवारों का गुज़ारा मुश्किल हो रहा है।
मशीन के सामानों से मुकाबला और भविष्य का खतरा
इस सेक्टर के लिए सबसे बड़ी चुनौती मशीन से बने नकली सामानों का बाज़ार में फैलना है। ये मशीन-निर्मित उत्पाद, असली हस्तनिर्मित चीज़ों के मुकाबले बहुत कम कीमत पर बेचे जाते हैं, जिससे पारंपरिक बुनकरों का बाज़ार खत्म हो रहा है। यह आर्थिक दबाव न केवल कारीगरों की रोज़ी-रोटी छीन रहा है, बल्कि युवा पीढ़ी को इस काम से दूर भी कर रहा है। कई कारीगरों को डर है कि कम मज़दूरी और इन शिल्पों को सीखने के लिए लगने वाली कड़ी ट्रेनिंग की वजह से युवा पीढ़ी इस पेशे से मुंह मोड़ रही है, जिससे सदियों पुरानी कलाएं खतरे में पड़ सकती हैं।
शिल्पकला को बचाने के सरकारी प्रयास
इन मुश्किलों से निपटने के लिए, हैंडीक्राफ्ट डिपार्टमेंट (Handicrafts Department) ने इस क्षेत्र की पारंपरिक उत्पादों को सुरक्षित रखने के लिए कमर कस ली है। इसका एक अहम कदम है जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग का इस्तेमाल, जो यह सर्टिफाई करता है कि कोई उत्पाद उसी खास इलाके में बना है और पारंपरिक तरीकों से तैयार हुआ है। फिलहाल, 68 नोटिफाइड क्राफ्ट्स में से 18 को GI टैग मिल चुका है। इसके अलावा, सरकार डिजिटल इंटीग्रेशन पर भी ध्यान दे रही है, ताकि कारीगर सीधे ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) जैसे प्लेटफॉर्म से सामान बेच सकें। इससे बिचौलियों को हटाकर, उन्हें बिक्री की पूरी रकम का बड़ा हिस्सा मिल सकेगा।
आगे क्या देखना ज़रूरी?
इस इंडस्ट्री का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या GI टैगिंग और आर्टिसन/वीवर्स क्रेडिट कार्ड (Artisans/Weavers Credit Card) जैसी स्कीमों से मिलने वाली आर्थिक मदद, कारीगरों की नेट इनकम को बढ़ाने में कामयाब होती है। आने वाले समय में, छोटे कारीगरों द्वारा डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपनाने की रफ़्तार, GI टैग वाले उत्पादों की एक्सपोर्ट मार्केट में ज़्यादा कीमत पाने की क्षमता, और कम लागत वाले नकली सामानों के प्रवाह को रोकने की क्षमता पर नज़र रखनी होगी।
