जम्मू-कश्मीर विधानसभा में मंगलवार को जमकर हंगामा हुआ। विपक्षी सदस्यों के वॉकआउट और छुट्टियों को लेकर छिड़े विवाद से कामकाज बाधित रहा। मार्केट एक्सपर्ट्स इसे रीजनल गवर्नेंस के लिए एक चेतावनी की तरह देख रहे हैं, क्योंकि इस तरह की राजनीतिक खींचतान प्रशासनिक फैसलों और पॉलिसी लागू करने में देरी ला सकती है।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के ऑटम सेशन में मंगलवार को बड़ा गतिरोध देखने को मिला। कार्यवाही तब बाधित हुई जब Bharatiya Janata Party (BJP) के सदस्यों ने सदन से वॉकआउट कर दिया। दरअसल, विपक्षी सदस्यों ने प्रशासन के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर चर्चा की मांग की थी, जिसे स्पीकर ने अस्वीकार कर दिया। यह टकराव ऐसे समय पर हुआ है जब विधानसभा सत्र का यह दूसरा ही दिन था।
छुट्टियों का विवाद
गतिरोध केवल भ्रष्टाचार के मुद्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि क्षेत्रीय छुट्टियों के कैलेंडर पर भी भारी बहस छिड़ गई। National Conference (NC) के विधायक Abdul Majid Larmi ने पार्टी संस्थापक Sheikh Mohammad Abdullah की जयंती और पुण्यतिथि पर फिर से सार्वजनिक अवकाश बहाल करने की मांग की। वहीं, People's Democratic Party (PDP) के विधायक Waheed Para ने 'Martyrs' Day' (13 जुलाई) को फिर से सरकारी छुट्टी घोषित करने की वकालत की। गौरतलब है कि 2019 के प्रशासनिक पुनर्गठन के बाद इस छुट्टी को कैलेंडर से हटा दिया गया था।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
मार्केट प्रतिभागियों और निवेशकों के लिए यह घटनाक्रम अहम है क्योंकि विधानसभा ही वह मंच है जहां नीतियां, बजट और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क पास होते हैं। जब सदन में इस तरह का शोर-शराबा होता है, तो इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और डेवलपमेंट एजेंडा से जुड़े महत्वपूर्ण एडमिनिस्ट्रेटिव फैसलों में देरी होने का जोखिम बढ़ जाता है। प्रशासनिक कुशलता और स्थिरता ही किसी भी क्षेत्र के बिजनेस एनवायरनमेंट को बेहतर बनाती है।
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या विधानसभा इन प्रक्रियात्मक बाधाओं से ऊपर उठकर कामकाज सुचारू रूप से शुरू कर पाएगी। भविष्य में आर्थिक मोर्चे पर प्रशासन कितनी तेजी से आगे बढ़ता है, यह सदन में चलने वाली कार्यवाही की शांति और स्थिरता पर ही निर्भर करेगा।
