जम्मू-कश्मीर विधानसभा में स्टेटहुड की बहाली को लेकर लाए गए प्रस्ताव पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार टकराव हुआ। हंगामे के कारण **25 सितंबर, 2026** को सत्र को स्थगित करना पड़ा, जिससे क्षेत्र की राजनीतिक स्थिरता और निवेश माहौल पर असर पड़ने की आशंका है।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में उस समय हालात बिगड़ गए जब मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने केंद्र शासित प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया। इस कदम का भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सदस्यों ने कड़ा विरोध किया, जिससे सदन में अफरा-तफरी मच गई।
विवाद की जड़
विवाद का मुख्य कारण प्रस्ताव में शामिल वह भाषा है, जिसमें पूर्व विधानसभा द्वारा वर्ष 2000 में पारित एक प्रस्ताव का जिक्र किया गया है। यह ऐतिहासिक दस्तावेज 1953 से पहले की स्वायत्तता की मांग करता है, जो क्षेत्रीय राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा है। भाजपा सदस्यों ने इसे पूरी तरह अनुचित बताते हुए सदन में प्रस्ताव की प्रतियां फाड़ दीं, जिसके बाद हाथापाई की स्थिति बन गई। स्पीकर Abdul Rahim Rather ने मजबूरन सत्र को 28 सितंबर, 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया।
निवेशकों के लिए क्यों जरूरी है यह खबर?
किसी भी क्षेत्र में निवेश करने से पहले निवेशक वहां की राजनीतिक स्थिरता को एक प्रमुख इंडिकेटर (Indicator) के तौर पर देखते हैं। जम्मू-कश्मीर में पर्यटन, हॉस्पिटैलिटी और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर पूरी तरह से लंबे समय की पॉलिसी स्टेबिलिटी पर टिके हैं। अगर सदन में इस तरह का गतिरोध बना रहता है, तो नए डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स और महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णयों की गति धीमी हो सकती है।
मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने विपक्षी दलों पर आरोप लगाया है कि वे स्टेटहुड के मुद्दे पर वोटिंग से बचने के लिए हंगामा कर रहे हैं। अब सबकी नजरें 28 सितंबर पर टिकी हैं, जब सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू होगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार किस तरह से इन विधायी बाधाओं को पार करती है, क्योंकि इसी पर राज्य के भविष्य के आर्थिक एजेंडे की दिशा तय होगी।
