जम्मू-कश्मीर में 'उम्मीद का ज़ायका': महिलाएं बन रहीं फूड बिजनेस की मालकिन!

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AuthorAditya Rao|Published at:
जम्मू-कश्मीर में 'उम्मीद का ज़ायका': महिलाएं बन रहीं फूड बिजनेस की मालकिन!

जम्मू और कश्मीर रूरल लाइवलीहुड मिशन (JKRLM) अब 'उम्मीद का ज़ायका' प्रोग्राम को बड़े पैमाने पर लागू कर रहा है। इस पहल का मकसद सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स (SHGs) की महिलाओं के कुकिंग हुनर को एक व्यवस्थित फूड सर्विस बिजनेस में बदलना है। ट्रेनिंग और ऑपरेशनल सपोर्ट देकर, यह मिशन पूरे क्षेत्र में टिकाऊ छोटे कारोबार खड़े करने पर ज़ोर दे रहा है।

जम्मू और कश्मीर रूरल लाइवलीहुड मिशन (JKRLM) अपने 'उम्मीद का ज़ायका' प्रोग्राम को तेज़ी से आगे बढ़ा रहा है। यह सरकारी पहल ग्रामीण महिलाओं के कुकिंग स्किल्स को प्रोफेशनल फूड सर्विस वेंचर्स में बदलने के लिए तैयार की गई है। इसका लक्ष्य होम-बेस्ड कुकिंग टैलेंट को एक ऑर्गेनाइज्ड फूड सर्विस बिजनेस का रूप देकर टिकाऊ माइक्रो-एंटरप्राइजेज तैयार करना है। फिलहाल, यह मॉडल सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स (SHGs) के ज़रिए लागू किया जा रहा है, जिन्हें फूड हाइजीन, सर्विस स्टैंडर्ड्स और बिजनेस मैनेजमेंट में खास ट्रेनिंग दी जा रही है।

कमर्शियल माइक्रो-एंटरप्राइजेज की ओर कदम

यह इनिशिएटिव ग्रामीण रोज़गार की एक बड़ी कमी को दूर करता है। यह SHG की एक्टिविटीज़ को घर के काम से निकालकर व्यवस्थित कमर्शियल ऑपरेशंस में बदल रहा है। इसमें शामिल महिलाओं को डिजिटल बिलिंग, इन्वेंटरी मैनेजमेंट और कस्टमर सर्विस की ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि वे हाई-फुटफॉल पब्लिक एरियाज़ में कियोस्क और कैफे चला सकें।

कई डिस्ट्रिक्ट्स में इसका असर दिखने लगा है। उदाहरण के लिए, गांदरबल के डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में नाहिदा मुश्ताक की टीम द्वारा मैनेज किया जाने वाला एक आउटलेट मरीजों और विज़िटर्स को खाना सर्व कर रहा है। इसी तरह, सांबा डिस्ट्रिक्ट में शीयतल गुप्ता द्वारा चलाए जा रहे प्रोजेक्ट में हर सदस्य हर महीने लगभग ₹20,000 से ₹22,000 कमा रही है। कुपवाड़ा में, यास्मीना रसूल की टीम रोज़ाना ₹5,000 से ₹6,000 का टर्नओवर कर रही है। ये आंकड़े दिखाते हैं कि पब्लिक इंस्टीट्यूशन्स में किफायती और हाइजेनिक खाने की अच्छी डिमांड है।

ऑपरेशनल स्ट्रैटेजी और सस्टेनेबिलिटी

JKRLM ने पूरे क्षेत्र में 8.10 लाख से ज़्यादा महिलाओं को 96,000 से ज़्यादा SHGs में ऑर्गेनाइज किया है। 'उम्मीद का ज़ायका' मॉडल इस मौजूदा नेटवर्क का फायदा उठाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह सिर्फ ट्रेनिंग ही नहीं, बल्कि नए बिजनेस ओनर्स के लिए एंट्री बैरियर्स को कम करने के लिए क्रेडिट और रिवॉल्विंग फंड्स की एक्सेस भी देता है। मिशन इसे 20 लोकेशंस तक बढ़ाने की प्लानिंग कर रहा है, और फिलहाल 13 डिस्ट्रिक्ट्स में ऑपरेशन्स एक्टिव हैं।

बिजनेस डेवलपमेंट के नज़रिए से, इन माइक्रो-एंटरप्राइजेज की सफलता सिर्फ शुरुआती सेटअप से कहीं ज़्यादा है। भले ही सरकारी सपोर्ट एक शुरुआती बूस्ट देता है, लेकिन इन यूनिट्स की लॉन्ग-टर्म वायबिलिटी कॉम्पिटिटिव मार्केट में इंडिपेंडेंटली ऑपरेट करने की उनकी क्षमता पर निर्भर करेगी। इन छोटे वेंचर्स के लिए मुख्य चुनौतियां दूरदराज या पहाड़ी इलाकों में लगातार सप्लाई चेन मैनेज करना, ऑपरेशन्स बढ़ने पर क्वालिटी कंट्रोल बनाए रखना और प्रोफेशनल बिजनेस इंफ्रास्ट्रक्चर सुनिश्चित करना शामिल है, ताकि वे अनौपचारिक और स्थापित वेंडरों से मुकाबला कर सकें। पब्लिक इंस्टीट्यूशनल स्पेसेज़ पर निर्भरता का मतलब यह भी है कि ये बिजनेसेज ऐसी जगहों के इस्तेमाल के संबंध में एडमिनिस्ट्रेटिव पॉलिसीज़ के प्रति सेंसिटिव रहेंगे। इन्वेस्टर्स और डेवलपमेंट ऑब्ज़र्वर्स अक्सर ऐसे इनिशिएटिव्स को ट्रैक करते हैं ताकि ग्रामीण माइक्रो-एंटरप्राइजेज को स्टेबल, सेल्फ-सस्टेनिंग बिजनेसेज में स्केल करने की सक्सेस रेट को समझा जा सके।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.