भारत का ग्रीन सेक्टर **2047** तक **$4.1 ट्रिलियन** के निवेश का बड़ा मौका दे रहा है, लेकिन स्टार्टअप्स लागत और सरकारी खरीद नीतियों के कारण बड़े स्तर पर विस्तार करने में संघर्ष कर रहे हैं।
भारत की ग्रीन इकोनॉमी एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। अनुमान है कि 2047 तक इसमें $4.1 ट्रिलियन का संचयी निवेश हो सकता है। इस क्षेत्र में न केवल लाखों नौकरियां पैदा करने की क्षमता है, बल्कि यह $1 ट्रिलियन से अधिक का सालाना बाजार भी खोल सकता है। हालांकि, कई उभरती कंपनियों के लिए पायलट प्रोजेक्ट से निकलकर बड़े कमर्शियल स्तर तक पहुंचना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।\n\n### प्राइस गैप की बड़ी समस्या\n\nतकनीक मौजूद है, लेकिन ग्रीन स्टार्टअप्स के लिए सबसे बड़ी बाधा 'प्राइस गैप' है। सस्टेनेबल विकल्प अक्सर पारंपरिक मैटेरियल्स से महंगे होते हैं। भारत जैसे मूल्य-संवेदनशील बाजार में, ग्रीन उत्पाद सस्ते विकल्पों के साथ सीधे मुकाबला नहीं कर पाते। जब तक ग्रीन समाधान पारंपरिक उत्पादों की कीमत के बराबर नहीं आता, तब तक कंपनियां सस्ते और कम टिकाऊ विकल्प चुनना पसंद करती हैं, जिससे नई टेक्नोलॉजी की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।\n\n### सरकारी खरीद (Procurement) में अड़चन\n\nस्टार्टअप्स के लिए सबसे बड़ा पेच सरकारी खरीद मॉडल में फंसा है। पब्लिक सेक्टर के प्रोजेक्ट्स में आमतौर पर 'L1' (सबसे कम बोली लगाने वाले) मॉडल को प्राथमिकता दी जाती है। चूंकि ग्रीन इनोवेशन अभी शुरुआती चरण में हैं, इसलिए उनकी उत्पादन लागत अधिक होती है। इस वजह से, सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स में सस्टेनेबल विकल्प अक्सर बाहर हो जाते हैं। जानकारों का मानना है कि जब तक सरकार अनिवार्य खरीद नीतियां नहीं लाती, तब तक बाजार में ग्रीन विकल्पों की मांग अस्थिर बनी रहेगी।\n\n### कॉरपोरेट इंडिया का साथ\n\nसरकारी खरीद में देरी के बीच, बड़ी भारतीय कंपनियां राहत बनकर उभरी हैं। कई कंपनियों ने नेट-जीरो लक्ष्य तय किए हैं, जिसके लिए वे अपनी सप्लाई चेन को बेहतर बना रही हैं। इससे स्टार्टअप्स को बड़े B2B पार्टनर मिल रहे हैं। Greenr जैसे एक्सेलरेटर्स ने इस दिशा में स्टार्टअप्स की काफी मदद की है।\n\n### डीप-टेक और रिसर्च की चुनौती\n\nScaNxt जैसी डीप-टेक कंपनियां मिट्टी की निगरानी के लिए काम कर रही हैं, लेकिन रिसर्च के लिए उन्हें लंबे समय तक भारी फंडिंग की जरूरत होती है। 'अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन' (Anusandhan National Research Foundation) जैसी फंडिंग योजनाओं की मांग बढ़ रही है ताकि स्टार्टअप्स अपने रिसर्च को कमर्शियल रूप दे सकें। निवेशकों की नजर इस सेक्टर पर है, हालांकि ग्लोबल अनिश्चितता के कारण क्लीन एनर्जी स्टॉक्स में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। अब देखना यह है कि सरकारी नीतियां कब प्रोत्साहन से हटकर अनिवार्य खरीद की ओर कदम बढ़ाती हैं।
