भारत सरकार ने 2047 तक स्टील उत्पादन को तीन गुना बढ़ाकर **604 मिलियन टन** करने का लक्ष्य रखा है। इस महत्वाकांक्षी योजना के साथ ही स्टील कंपनियों के सामने ग्रीन ट्रांजिशन और बढ़ते खर्चों को मैनेज करने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
भारत का 2047 तक अपनी सालाना स्टील उत्पादन क्षमता को 604 मिलियन टन तक ले जाने का लक्ष्य औद्योगिक क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव है। लेकिन इस विस्तार के साथ एक जटिल चुनौती जुड़ी है—उत्पादन बढ़ाना, लेकिन कार्बन फुटप्रिंट को कम रखना। इसके लिए कंपनियों को पारंपरिक कोल-आधारित ब्लास्ट फर्नेस से हटकर नई तकनीकों को अपनाना होगा।
कंपनियों पर बढ़ेगा निवेश का बोझ
Tata Steel, JSW Steel, और Steel Authority of India (SAIL) जैसी दिग्गज कंपनियां वर्तमान में कोयले पर निर्भर हैं। 'ग्रीन स्टील' की ओर बढ़ने के लिए ग्रीन हाइड्रोजन या नेचुरल गैस जैसी तकनीकों में भारी-भरकम कैपिटल इन्वेस्टमेंट की जरूरत होगी। इसका सीधा असर शॉर्ट से मीडियम टर्म में कंपनी के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ सकता है और कर्ज (Debt) का स्तर भी बढ़ सकता है। निवेशकों के लिए यह देखना जरूरी होगा कि कंपनियां अपने मुनाफे को बचाते हुए इस बदलाव का खर्च कैसे उठाती हैं।
छोटे खिलाड़ियों के लिए अस्तित्व का संकट
यह चुनौती सभी के लिए एक जैसी नहीं है। बड़े स्टील मेकर्स के पास तकनीक में निवेश करने के लिए संसाधन हैं, लेकिन छोटे सेकेंडरी स्टील प्रोड्यूसर्स के लिए यह बेहद मुश्किल हो सकता है। यदि सरकारी नीतियां सभी के लिए एक समान रहीं, तो कई छोटी फर्मों पर बंद होने या मर्जर का दबाव बन सकता है।
ग्लोबल रिस्क: CBAM का असर
यूरोपीय संघ का Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) एक बड़ी बाधा है। यह उन उत्पादों पर टैक्स लगाता है जो निर्माण के दौरान ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करते हैं। भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए अब ग्रीन ट्रांजिशन सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि कमर्शियल मजबूरी बन गया है।
निवेशकों को अब सरकार के उस रोडमैप पर नजर रखनी चाहिए, जिसमें ग्रीन स्टील सब्सिडी, एनर्जी पॉलिसी और कैपेसिटी एक्सपेंशन के नियम तय किए जाएंगे। बिना स्पष्ट लक्ष्यों के, कंपनियों के लिए ग्रीन ट्रांजिशन की राह और अधिक महंगी साबित हो सकती है।
