भारत के प्रमुख जलाशयों (Reservoirs) में पानी का स्तर तेजी से गिरकर **66.7%** पर आ गया है। ऐतिहासिक औसत से नीचे गए जलस्तर के कारण आने वाले रबी सीजन पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, जिसका सीधा असर रूरल डिमांड और फूड इंफ्लेशन पर दिख सकता है।
पानी का संकट और चिंताजनक आंकड़े
सेंट्रल वॉटर कमीशन (CWC) ने देश की वॉटर सिक्योरिटी को लेकर चेतावनी जारी की है। 22 अक्टूबर तक के आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में कुल जल भंडारण गिरकर 123.228 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) रह गया है, जो 15 अक्टूबर को 126.717 BCM था। यह लेवल पिछले साल के मुकाबले और 10 साल के ऐतिहासिक औसत से काफी कम है।
दक्षिण भारत में सबसे गंभीर स्थिति
सबसे ज्यादा असर दक्षिण भारत में देखने को मिल रहा है, जहाँ आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के जलाशयों में क्षमता का मात्र 42.34% पानी ही बचा है। तमिलनाडु के मेट्टूर और वैगई जैसे प्रमुख बांध अपनी क्षमता से बहुत नीचे चल रहे हैं, जिससे सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता सीमित हो गई है।
रबी फसलों पर असर और मार्केट कनेक्शन
रबी सीजन की फसलों जैसे गेहूं, दालों और तिलहन के लिए सिंचाई सबसे महत्वपूर्ण इनपुट है। पानी की कमी का सीधा असर पैदावार (Yield) पर पड़ेगा, जिससे ग्रामीण इलाकों में कृषि से जुड़े सामानों जैसे फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड्स की मांग प्रभावित हो सकती है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
इन्वेस्टर्स को अब फूड इंफ्लेशन और रूरल स्पेंडिंग पर नजर रखनी होगी। अगर पानी की कमी बनी रहती है, तो यह कमोडिटी प्राइसेज और फूड-प्रोसेसिंग कंपनियों की सप्लाई चेन कॉस्ट को प्रभावित कर सकता है। मार्केट एक्सपर्ट्स अब सरकार की इरिगेशन पॉलिसी और रबी बुवाई की प्रोग्रेस को ट्रैक कर रहे हैं ताकि कृषि अर्थव्यवस्था में संभावित जोखिम का आकलन किया जा सके।
