भारत की प्रेस फ्रीडम रैंकिंग में भारी गिरावट, पहुंचा 157वें स्थान पर!

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AuthorNeha Patil|Published at:
भारत की प्रेस फ्रीडम रैंकिंग में भारी गिरावट, पहुंचा 157वें स्थान पर!
Overview

भारत की प्रेस फ्रीडम रैंकिंग में चिंताजनक गिरावट आई है, जो अब 180 देशों में 157वें स्थान पर पहुंच गई है। सरकारी सूचनाओं में कमी और सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के सामने चुनौतियां जनता की महत्वपूर्ण डेटा तक पहुंच को कम कर रही हैं, जिससे लोकतांत्रिक जवाबदेही और डिजिटल युग में सूचना की स्थिति पर चिंताएं बढ़ गई हैं।

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घटती पारदर्शिता और सरकारी सूचनाओं का अभाव

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (Reporters Without Borders) की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index) में भारत की स्थिति काफी खराब हो गई है। भारत अब 180 देशों में 157वें स्थान पर है। यह बड़ी गिरावट मौजूदा सरकार के तहत पारदर्शिता में आई कमी को दर्शाती है।

सरकारी गोपनीयता और गलत सूचना का प्रसार

जहां पहले सरकारी कामकाज की नियमित ब्रीफिंग होती थी, वहीं हाल के दिनों में 'ऑपरेशनल संवेदनशीलता' के कारण सूचनाओं में आई कमी से गलत सूचनाओं और जनता की बेचैनी को बढ़ावा मिल रहा है। यह दिखाता है कि सरकार सूचनाओं को नियंत्रित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिसका असर जनता की धारणा और विश्वास पर पड़ रहा है।

RTI की प्रभावशीलता पर सवाल

सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की प्रभावशीलता भी खतरे में है। जवाबों में कमी और 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' जैसे नए कानूनों में व्यक्तिगत जानकारी को छूट देने जैसे प्रावधानों से सूचना की पहुंच और भी सीमित हो सकती है। ये सब मिलकर नागरिकों की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करने की क्षमता को कमजोर कर रहे हैं, जो कि एक सूचित समाज के लिए बेहद जरूरी है।

मीडिया का अनुपालन और घटती जवाबदेही

एक ऐसे मीडिया माहौल का उभरना जो अधिक अनुपालन करता है, लोकतांत्रिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब मीडिया, जिसे 'चौथा स्तंभ' कहा जाता है, अपनी जांच की भूमिका में सीमित हो जाता है, तो सरकारें कम सार्वजनिक जवाबदेही के साथ काम कर सकती हैं। सूचना का एक सार्वजनिक सेवा से एक वस्तु में बदलना, जो अपने सामाजिक भूमिका से अलग हो गया है, हमारे सूचना-केंद्रित युग में एक बड़ी बाधा प्रस्तुत करता है। इस बदलाव से ऐसा माहौल बनने का खतरा है जहां महत्वपूर्ण जानकारी कम सुलभ होगी, जिसका असर सार्वजनिक विमर्श और शासन पर पड़ सकता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.