घटती पारदर्शिता और सरकारी सूचनाओं का अभाव
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (Reporters Without Borders) की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index) में भारत की स्थिति काफी खराब हो गई है। भारत अब 180 देशों में 157वें स्थान पर है। यह बड़ी गिरावट मौजूदा सरकार के तहत पारदर्शिता में आई कमी को दर्शाती है।
सरकारी गोपनीयता और गलत सूचना का प्रसार
जहां पहले सरकारी कामकाज की नियमित ब्रीफिंग होती थी, वहीं हाल के दिनों में 'ऑपरेशनल संवेदनशीलता' के कारण सूचनाओं में आई कमी से गलत सूचनाओं और जनता की बेचैनी को बढ़ावा मिल रहा है। यह दिखाता है कि सरकार सूचनाओं को नियंत्रित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिसका असर जनता की धारणा और विश्वास पर पड़ रहा है।
RTI की प्रभावशीलता पर सवाल
सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की प्रभावशीलता भी खतरे में है। जवाबों में कमी और 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' जैसे नए कानूनों में व्यक्तिगत जानकारी को छूट देने जैसे प्रावधानों से सूचना की पहुंच और भी सीमित हो सकती है। ये सब मिलकर नागरिकों की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करने की क्षमता को कमजोर कर रहे हैं, जो कि एक सूचित समाज के लिए बेहद जरूरी है।
मीडिया का अनुपालन और घटती जवाबदेही
एक ऐसे मीडिया माहौल का उभरना जो अधिक अनुपालन करता है, लोकतांत्रिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब मीडिया, जिसे 'चौथा स्तंभ' कहा जाता है, अपनी जांच की भूमिका में सीमित हो जाता है, तो सरकारें कम सार्वजनिक जवाबदेही के साथ काम कर सकती हैं। सूचना का एक सार्वजनिक सेवा से एक वस्तु में बदलना, जो अपने सामाजिक भूमिका से अलग हो गया है, हमारे सूचना-केंद्रित युग में एक बड़ी बाधा प्रस्तुत करता है। इस बदलाव से ऐसा माहौल बनने का खतरा है जहां महत्वपूर्ण जानकारी कम सुलभ होगी, जिसका असर सार्वजनिक विमर्श और शासन पर पड़ सकता है।
