डॉ. सिल्विया करपागम की नई किताब 'The Meat of the Matter' ने भारत की सरकारी पोषण नीतियों पर तीखे सवाल उठाए हैं। लेखक का तर्क है कि सरकारी योजनाओं में शाकाहारी भोजन को प्राथमिकता देने से हाशिए पर रहने वाले समुदायों की पोषण संबंधी जरूरतें नजरअंदाज हो रही हैं।
भारत में सरकारी पोषण नीतियों को लेकर बहस छिड़ गई है। डॉ. सिल्विया करपागम ने अपनी किताब 'The Meat of the Matter' में तर्क दिया है कि सरकारी कार्यक्रमों में शाकाहारी खाने को अत्यधिक महत्व दिया जाता है, जो उन समुदायों के लिए हानिकारक हो सकता है जिनके लिए मांसाहार पारंपरिक पोषण का स्रोत रहा है।
बायोडायवर्सिटी और पोषक तत्वों का अवशोषण
किताब में सबसे बड़ा मुद्दा 'बायोअवेलेबिलिटी' (शरीर द्वारा पोषक तत्वों को सोखने की क्षमता) का है। हालांकि सरकार मिलेट्स और सोया जैसे पौधों पर आधारित विकल्पों को बढ़ावा दे रही है, लेकिन डॉ. करपागम का कहना है कि ये स्रोत पशु-आधारित भोजन की तुलना में कम पोषक तत्व प्रदान करते हैं। इससे दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों की पोषण संबंधी जरूरतों पर असर पड़ रहा है।
मिड-डे मील पर सवाल
मिड-डे मील योजनाओं में अंडे या मछली जैसे सस्ते और सुलभ पोषण स्रोतों को शामिल न करना एक बड़ी चूक मानी जा रही है। लेखिका ने अंतरराष्ट्रीय शोध का हवाला देते हुए बताया है कि कोलेस्ट्रॉल को लेकर फैली भ्रांतियों के कारण इन पोषक तत्वों को मेनू से बाहर रखा गया है, जो कि वैज्ञानिक रूप से अब तर्कहीन लगता है।
कॉरपोरेट नैरेटिव का प्रभाव
इस बहस का एक और गंभीर पहलू कॉरपोरेट जगत का दखल है। किताब में चेतावनी दी गई है कि अत्यधिक प्रोसेस्ड और लैब-ग्रोन भोजन को बढ़ावा देने से स्थानीय और विविधतापूर्ण खाद्य प्रणालियां कमजोर हो रही हैं। 'शुद्ध' भोजन के नाम पर पारंपरिक खाद्य विकल्पों को दरकिनार किया जा रहा है, जिससे लंबे समय में खाद्य संप्रभुता (Food Sovereignty) खतरे में पड़ सकती है। अब देखना यह है कि क्या भविष्य की नीतियां इन सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखेंगी या शाकाहारी मानकों पर ही टिकी रहेंगी।
