Goa, Uttarakhand और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में लागू हो रहे 'डिपॉजिट रिटर्न स्कीम' (DRS) से FMCG सेक्टर की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। कंपनियों को अब प्लास्टिक और ग्लास पैकेजिंग के लिए रिवर्स लॉजिस्टिक्स और डिजिटल ट्रैकिंग का सहारा लेना होगा, जिससे उनके ऑपरेशनल खर्चों में बढ़ोत्तरी तय है।
भारत के कई राज्य, जिनमें गोवा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश प्रमुख हैं, प्लास्टिक और ग्लास कचरे को मैनेज करने के लिए 'डिपॉजिट रिटर्न स्कीम' (DRS) लेकर आए हैं। इस पहल का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण को बचाना है, लेकिन इसके चलते FMCG, बेवरेज और लिकर कंपनियों को अब अपने कामकाज के तरीके में बड़ा बदलाव करना होगा।
कंपनियों के सामने नई चुनौती
अब कंपनियों को अपनी पैकेजिंग की पूरी लाइफसाइकिल खुद मैनेज करनी होगी। कंपनियों को क्यूआर कोड (QR Code) आधारित डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लगाना होगा ताकि कंटेनर को बिक्री से लेकर कलेक्शन तक ट्रैक किया जा सके। यह भारत के मौजूदा 'एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी' (EPR) नियमों का ही विस्तार है।
निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा अलर्ट ऑपरेटिंग कॉस्ट (Operating Cost) है। कंपनियों को रिवर्स लॉजिस्टिक्स के लिए नया इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना होगा। हर यूनिट पर ₹2 से ₹10 तक का रिफंडेबल डिपॉजिट मैनेज करना उनके कैश फ्लो पर असर डाल सकता है।
अब कंपनियों के सामने दो रास्ते हैं:
- इस अतिरिक्त खर्च को खुद झेलें, जिससे प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा।
- कीमतों को बढ़ाकर इसका बोझ ग्राहकों पर डालें, जिससे डिमांड घटने का रिस्क बना रहेगा।
आगे की रणनीति
आने वाले समय में इन कंपनियों के क्वार्टरली नतीजों पर नजर रखना जरूरी होगा। एनालिस्ट्स इस बात पर गौर करेंगे कि कंपनियां अपने लॉजिस्टिक्स को कितनी कुशलता से संभालती हैं। मैनेजमेंट कमेंट्री में बढ़ते हुए सेलिंग और एडमिनिस्ट्रेटिव खर्चों का जिक्र होना तय है, जो स्टॉक की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाएंगे।
