भारत में मेडिकल डिवाइस बनाने वाली कंपनियों ने सरकार से 'ड्रग्स, मेडिकल डिवाइस और कॉस्मेटिक्स बिल, 2026' में संशोधन की मांग की है। उद्योग जगत का कहना है कि अगर इंजीनियरिंग उत्पादों को फार्मा की तरह माना गया, तो छोटे-मोटे डॉक्यूमेंटेशन की गलतियों पर भी कड़ी क्रिमिनल पेनल्टी लग सकती है, जो **15 बिलियन डॉलर** से अधिक के इस सेक्टर के विकास को रोक सकती है।
बिल पर क्यों मचा है बवाल?
भारतीय मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री ने स्वास्थ्य मंत्रालय से 'ड्रग्स, मेडिकल डिवाइस और कॉस्मेटिक्स बिल, 2026' पर पुनर्विचार करने की अपील की है। 8 अगस्त, 2026 को सबमिट की गई एक याचिका में, इंडस्ट्री एसोसिएशन्स ने चिंता जताई है कि प्रस्तावित कानून फार्मास्युटिकल दवाओं और मेडिकल डिवाइस के बीच अंतर नहीं करता है।
क्या है मुख्य विवाद?
मुख्य विवाद मेडिकल डिवाइस के वर्गीकरण को लेकर है। निर्माताओं का कहना है कि स्टेंट, इम्प्लांट और इमेजिंग मशीन जैसे डिवाइस केमिकल पदार्थ नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग उत्पाद हैं। उनका तर्क है कि बिल 'एडल्टेरेटेड' (adulterated) और 'स्प्यूरियस' (spurious) जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है, जो आमतौर पर दवाओं के लिए इस्तेमाल होते हैं। इंडस्ट्री को डर है कि इस गलत वर्गीकरण से रेगुलेटरी कंफ्यूजन बढ़ेगा और अनुपालन की ऐसी जरूरतें आएंगी जो मेडिकल हार्डवेयर के टेक्निकल नेचर के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं होंगी।
सबसे बड़ी चिंता: क्रिमिनल पेनल्टी
कंपनियों और निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता छोटे-मोटे रेगुलेटरी लैप्स, जैसे लेबलिंग की गलतियाँ या डॉक्यूमेंटेशन की चूक के लिए क्रिमिनल पेनल्टी का प्रावधान है। निर्माताओं का कहना है कि ऐसे प्रावधान मैनेजमेंट और फर्मों को जेल तक ले जा सकते हैं, भले ही किसी मरीज को कोई नुकसान न हुआ हो। इंडस्ट्री बॉडीज का तर्क है कि यह तरीका US FDA या यूरोपीय संघ के मेडिकल डिवाइस रेगुलेशन (EU MDR) जैसे ग्लोबल रेगुलेटरी फ्रेमवर्क से अलग है। ये अंतरराष्ट्रीय मानक आमतौर पर एडमिनिस्ट्रेटिव गलतियों के लिए आपराधिककरण के बजाय क्वालिटी मैनेजमेंट सिस्टम और रिस्क-बेस्ड कन्फॉर्मिटी असेसमेंट पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
'मेक इन इंडिया' पर असर?
यह विधायी बहस ऐसे समय में आई है जब भारत खुद को मेडिकल डिवाइस मैन्युफैक्चरिंग के ग्लोबल हब के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। 15 बिलियन डॉलर से अधिक का यह सेक्टर 7-8 अगस्त को आयोजित 'इंडिया मेडिकल डिवाइस 2026' कॉन्फ्रेंस का एक अहम हिस्सा था। एक सख्त रेगुलेटरी माहौल घरेलू और विदेशी निवेश को हतोत्साहित कर सकता है, क्योंकि फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री के लिए डिज़ाइन किए गए फ्रेमवर्क को नेविगेट करने में कानूनी और ऑपरेशनल जोखिमों को लेकर कंपनियां सतर्क हो सकती हैं।
सरकार का हालिया रुख
सरकार का हालिया रेगुलेटरी रुख अनिश्चितता को और बढ़ाता है। 6 अगस्त, 2026 को, स्वास्थ्य मंत्रालय ने नए नियम अधिसूचित किए थे, जो नकली या मनगढ़ंत डेटा जमा करने वाली फार्मा कंपनियों को डीबार करने के लिए रेगुलेटर्स को सशक्त बनाते हैं। हालांकि यह कदम दवाओं की गुणवत्ता में सुधार के लिए है, लेकिन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री को डर है कि इसी तरह का कठोर, 'वन-साइज़-फिट्स-ऑल' एनफोर्समेंट अप्रोच मेडटेक स्पेस में निर्माण की अनूठी चुनौतियों को ध्यान में नहीं रखेगा।
आगे क्या?
निवेशकों और हितधारकों के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार चल रही कंसल्टेशन प्रक्रिया के दौरान इन याचिकाओं पर कैसे प्रतिक्रिया देती है। कोई भी संशोधन जो बिल को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप लाता है और गैर-भौतिक त्रुटियों के लिए क्रिमिनल पेनल्टी को हटाता या नरम करता है, वह सेक्टर की ऑपरेशनल स्थिरता और भविष्य के विकास के लिए एक सकारात्मक संकेत होगा।
