भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। अनुमान है कि 2030 तक इनका एसेट मैनेजमेंट **₹21 लाख करोड़** तक पहुंच जाएगा, जो कि मौजूदा **₹7.09 लाख करोड़** से करीब तीन गुना ज्यादा है। डेटा सेंटर, बैटरी स्टोरेज और सरकारी यूटिलिटीज जैसे क्षेत्रों में एसेट मोनेटाइजेशन (Asset Monetization) इस ग्रोथ को बढ़ावा दे रहा है।
Detailed Coverage
रोड इंफ्रा से आगे बढ़ रहा है InvITs का कारोबार
InvITs, जो म्यूचुअल फंड की तरह काम करते हैं, खास तौर पर टोल रोड, पावर ट्रांसमिशन और टेलीकॉम फाइबर जैसी रेवेन्यू-जेनरेटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए बनाए गए हैं। हालांकि अभी इस सेक्टर में रोड इंफ्रा एसेट्स का दबदबा है, लेकिन भविष्य में ग्रोथ का नया रास्ता डेटा सेंटर, बड़े पैमाने पर बैटरी स्टोरेज और शहरी यूटिलिटी प्रोजेक्ट्स से आने की उम्मीद है। सरकार की एसेट मोनेटाइजेशन की पहल भी इसमें अहम भूमिका निभा रही है, जिससे सरकारी कंपनियां अपने मौजूदा इंफ्रा से वैल्यू अनलॉक कर नई परियोजनाओं में निवेश कर रही हैं।
रेलवे एसेट्स का मोनेटाइजेशन भी एक बड़ा मौका है। सरकारी बैलेंस शीट से इन ट्रस्टों में एसेट्स को ट्रांसफर करने से पूंजी का बेहतर इस्तेमाल होता है, जिसे देश भर में नई डेवलपमेंट परियोजनाओं में लगाया जा सकता है।
निवेशकों की सुरक्षा और भागीदारी
2014 से सेबी (SEBI) ने एक ऐसा फ्रेमवर्क तैयार किया है जो ग्रोथ और निवेशक सुरक्षा दोनों का ध्यान रखता है। इसके तहत, ट्रस्टों को कम से कम 80% एसेट्स ऑपरेशनल और इनकम-जेनरेटिंग प्रोजेक्ट्स में निवेश करना होता है। साथ ही, उन्हें हर छह महीने में अपने नेट डिस्ट्रिब्यूटेबल कैश फ्लो का 90% निवेशकों को बांटना जरूरी है। यह नियम निवेशकों को एक भरोसेमंद इनकम स्ट्रीम देता है, जो ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स के मुकाबले कहीं ज्यादा सुरक्षित है।
फिलहाल, भारत में करीब 27 InvITs हैं, जिनमें पब्लिकली लिस्टेड और प्राइवेटली प्लेस्ड दोनों तरह के व्हीकल्स शामिल हैं। जहां लिस्टेड InvITs रिटेल निवेशकों के लिए खुले हैं, वहीं कई ट्रस्ट इंश्योरेंस कंपनियों, पेंशन फंडों और बड़े संस्थानों के पास हैं। अब रेग्युलेटर्स (Regulators) इन प्राइवेट एंटिटीज को स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट कराने के तरीके तलाश रहे हैं, ताकि लिक्विडिटी (Liquidity) और रिटेल पहुंच बढ़ सके। क्यूब हाईवेज ट्रस्ट (Cube Highways Trust) का ₹5,000 करोड़ का हालिया पब्लिक ऑफरिंग इस ट्रेंड के जारी रहने की ओर इशारा करता है।
निवेशक इस सेक्टर में रेग्युलेटरी डेवलपमेंट पर नजर रख सकते हैं, खासकर संस्थागत निवेशकों के लिए निवेश सीमा बढ़ाने जैसे कदमों पर, जिससे इंडस्ट्री के लिए उपलब्ध पूंजी का पूल और बढ़ सकता है। मुख्य फोकस अंडरलाइंग एसेट्स की ऑपरेशनल स्थिरता और नए, विविध इंफ्रा प्रोजेक्ट्स को इंटीग्रेट करते हुए लगातार कैश डिस्ट्रिब्यूशन बनाए रखने की क्षमता पर रहेगा।
