भारत ने करीब **26.43 मिलियन किलोलीटर** की खाली पड़ी फर्मेंटेशन क्षमता की पहचान की है, जिसका इस्तेमाल स्मार्ट प्रोटीन बनाने में हो सकता है। इससे कंपनियों का भारी कैपिटल खर्च बचेगा।
भारत के पास वैश्विक स्मार्ट प्रोटीन मार्केट में अपनी जगह बनाने का एक सुनहरा मौका है। Good Food Institute India और Sathguru Management Consultants की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का फर्मेंटेशन नेटवर्क 198 मिलियन किलोलीटर का है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा अभी इस्तेमाल नहीं हो रहा है। अगर कंपनियां इस 26.43 मिलियन किलोलीटर की खाली क्षमता को स्मार्ट प्रोटीन के लिए री-परपज (repurpose) कर लें, तो उन्हें नए ग्रीनफील्ड प्लांट बनाने का भारी खर्च नहीं उठाना पड़ेगा।
मौजूद एसेट्स का इस्तेमाल
आमतौर पर स्मार्ट प्रोटीन जैसे प्लांट-बेस्ड या कल्टीवेटेड प्रोटीन सेक्टर में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के लिए बहुत बड़ा निवेश चाहिए होता है। लेकिन मौजूदा बायोफार्मा और एंजाइम प्लांट्स में थोड़ा बदलाव (retrofitting) करके कंपनियां तेजी से काम शुरू कर सकती हैं। इन प्लांट्स में पहले से ही बायो-रिएक्टर्स और मशीनरी मौजूद होती है, जो प्रिसिजन फर्मेंटेशन के लिए जरूरी है। रिपोर्ट का दावा है कि अगर केवल 20% खाली क्षमता का भी सही इस्तेमाल हो जाए, तो यह 2025 तक की वैश्विक लैक्टोफेरिन (lactoferrin) मांग को पूरा कर सकता है। यह कदम सरकार की BioE3 पॉलिसी 2024 और NITI Aayog के 2035 रोडमैप के लक्ष्यों के भी अनुरूप है।
चुनौतियां और रिस्क
इतनी बड़ी संभावनाओं के बावजूद, राह आसान नहीं है। खाली प्लांट को फूड-ग्रेड इंग्रीडिएंट्स बनाने के लिए तैयार करने में सख्त रेगुलेटरी अप्रूवल्स की जरूरत होती है। इसके अलावा, भारत अभी भी बायोप्रासेसिंग इक्विपमेंट के लिए आयात पर निर्भर है, जिससे कॉस्ट और सप्लाई चेन में देरी हो सकती है। निवेशकों को यह भी देखना होगा कि क्या ये कंपनियां पारंपरिक प्रोटीन के मुकाबले सस्ती कीमत पर उत्पाद बाजार में उतार पाती हैं।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
निवेशकों को अब प्रोजेक्ट्स की गति, रेगुलेटरी मंजूरियों और डोमेस्टिक व एक्सपोर्ट मार्केट में मांग के ट्रेंड्स पर नजर रखनी चाहिए। ध्यान रखें कि जिन कंपनियों के पास पहले से ही कर्ज का बोझ है, उनके लिए ये तकनीकी बदलाव महंगे साबित हो सकते हैं, इसलिए सावधानी जरूरी है।
