Animal Testing Rules: नियमों में ढील से फार्मा कंपनियों को मिलेगी रफ्तार, लेकिन ESG मानकों पर मंडराया खतरा

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Animal Testing Rules: नियमों में ढील से फार्मा कंपनियों को मिलेगी रफ्तार, लेकिन ESG मानकों पर मंडराया खतरा

सरकार के नए ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के अनुसार, अब एनिमल टेस्टिंग की मंजूरी CCSEA के बजाय आंतरिक कमेटियों (IAEC) द्वारा दी जाएगी। इससे रिसर्च का काम तेज होगा, लेकिन एथिकल मानकों को लेकर खड़े हुए सवालों से ESG-केंद्रित निवेशक सतर्क हैं।

क्या बदला है नियमों में?

मंत्रालय द्वारा 30 सितंबर को जारी किए गए ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के तहत, अब एक्सपेरिमेंटल अप्रूवल की ताकत सरकार द्वारा नियुक्त कमिटी CCSEA के हाथ से निकलकर सीधे कंपनियों की अपनी 'Institutional Animal Ethics Committees' (IAEC) के पास चली जाएगी। इसका सीधा मतलब है कि अब रिसर्च कंपनियां खुद अपने टेस्टिंग प्रोटोकॉल को हरी झंडी दे सकेंगी।

फार्मा सेक्टर पर क्या असर होगा?

भारतीय फार्मा और बायोटेक कंपनियों के लिए यह एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हो सकता है। CRO (कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन) सेक्टर, जो अपनी स्पीड और लागत-दक्षता के लिए जाना जाता है, उसे एडमिनिस्ट्रेटिव क्लीयरेंस मिलने में कम समय लगेगा। इससे नई दवाओं की प्री-क्लिनिकल रिसर्च और उनके ट्रायल की प्रक्रिया पहले से कहीं ज्यादा तेजी से पूरी की जा सकेगी।

विवाद और ESG चुनौतियां

इस कदम का कड़ा विरोध PETA India और अन्य पशु अधिकार समूहों द्वारा किया जा रहा है। विरोधियों का कहना है कि खुद की निगरानी खुद करने से हितों का टकराव (Conflict of interest) पैदा होगा, खासकर बड़े जानवरों पर प्रयोग के मामले में।

सबसे अहम बात यह है कि भारतीय फार्मा कंपनियां अमेरिका और यूरोप जैसे ग्लोबल बाजारों में सक्रिय हैं। वहां की कंपनियां और नियामक ESG (एनवायर्नमेंटल, सोशल एंड गवर्नेंस) मानकों को लेकर बेहद सख्त हैं। यदि भारत के नियम अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल नहीं खाते हैं, तो भारतीय कंपनियों को विदेशी साझेदारी या एक्सपोर्ट के दौरान बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल, मंत्रालय ने इस पर जनता से फीडबैक मांगा है, और इसके अंतिम स्वरूप पर ही फार्मा सेक्टर का भविष्य निर्भर करेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.