भारत की उच्च शिक्षा का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है! QS World University Rankings 2027 के एडिशन में भारत के **52** संस्थानों को जगह मिली है, जबकि 2015 में यह आंकड़ा सिर्फ **11** था। सरकार की नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) और दूसरे पॉलिसी सुधारों का असर साफ दिख रहा है।
2015 से 2027 तक का सफर
भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र में पिछले एक दशक में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। QS World University Rankings में अब 52 भारतीय संस्थान शामिल हैं, जो 2015 में सिर्फ 11 थे। शिक्षा मंत्रालय के राज्य मंत्री, सुकांत मजूमदार, ने 10 अगस्त 2026 को लोकसभा में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह प्रगति सरकारी नीतियों और सुधारों का नतीजा है।
NIRF का कमाल
इस बड़ी छलांग की मुख्य वजह सरकार द्वारा 2015 में शुरू किया गया नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) है। NIRF का मकसद देश की यूनिवर्सिटीज को टीचिंग, रिसर्च, रिसोर्स और पहचान जैसे पैमानों पर रैंक करके उनमें कॉम्पिटिशन बढ़ाना था। इस फ्रेमवर्क से शिक्षा क्षेत्र में भागीदारी बढ़ी है, जहां 2021 में 4,030 संस्थानों ने हिस्सा लिया था, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 7,692 हो गई। रैंकिंग के लिए आवेदन करने वाले संस्थानों की संख्या भी 6,272 से बढ़कर 14,163 हो गई है।
सरकारी नीतियां और सपोर्ट
NIRF के अलावा, सरकार ने अकादमिक स्टैंडर्ड्स को बेहतर बनाने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 ने मल्टीडिसिप्लिनरी लर्निंग और क्रिटिकल थिंकिंग को बढ़ावा दिया है। फंडिंग के लिए, राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA) और प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान (PM-USHA) जैसी योजनाएं इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और रिसर्च-केंद्रित यूनिवर्सिटीज बनाने के लिए पैसा मुहैया करा रही हैं। 'इंस्टीट्यूशंस ऑफ एमिनेंस' (IoE) स्कीम के तहत टॉप संस्थानों को ज्यादा स्वायत्तता मिली है, जिससे वे ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के मुताबिक अपने कोर्स और रिसर्च को बेहतर बना सकें।
चुनौतियां और भविष्य की राह
वैश्विक रैंकिंग में भारत का प्रदर्शन सुधरना एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन एक्सपर्ट्स और पॉलिसी ऑब्जर्वर कुछ चुनौतियों की ओर इशारा कर रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौती सेंट्रल संस्थानों और राज्य सरकार के संस्थानों के बीच परफॉर्मेंस गैप है। रिसर्च आउटपुट, जैसे पेटेंट फाइलिंग और पब्लिकेशन, अक्सर कुछ चुनिंदा सेंट्रल संस्थानों में ही सिमट कर रह जाती है, जिससे कई राज्य स्तरीय संस्थानों की ग्लोबल पहचान कम हो जाती है।
इसके अलावा, राज्यस्तरीय शिक्षा योजनाओं के लिए फंडिंग में स्थिरता एक और चिंता का विषय है। फंडिंग में उतार-चढ़ाव से लॉन्ग-टर्म इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स प्रभावित हो सकते हैं। वहीं, यह भी देखा जा रहा है कि रैंकिंग के तरीके हमेशा भारत जैसे विविध सिस्टम में सामाजिक प्रभाव या समान पहुंच को पूरी तरह से नहीं दर्शा पाते। भविष्य में यह देखना होगा कि सरकारी योजनाएं रिसर्च गैप को कितनी अच्छी तरह पाट पाती हैं और रैंकिंग में सुधार के साथ-साथ शिक्षा की गुणवत्ता सभी स्तरों पर बनी रहती है या नहीं।
