देशभर की यूनिवर्सिटीज अब AI-स्किल की बढ़ती डिमांड को पूरा करने के लिए **500** नए कोर्स शुरू कर रही हैं। यह पहल न केवल एम्प्लॉयबिलिटी गैप को कम करेगी, बल्कि IT और सर्विस सेक्टर के लिए टैलेंट पाइपलाइन को भी नया रूप देगी।
भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। साल 2026 में सरकार ने देशभर के संस्थानों में 500 नए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्रोग्राम्स शुरू करने का ऐलान किया है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य एकेडमिक्स को लेबर मार्केट की जरूरतों के हिसाब से ढालना है, जहां अब ट्रेडिशनल डिग्री से ज्यादा व्यावहारिक AI स्किल को महत्व दिया जा रहा है।
क्रॉस-डिसिप्लिनरी अप्रोच
यह बदलाव सिर्फ कंप्यूटर साइंस तक सीमित नहीं है। अब कानून, चिकित्सा, मैनेजमेंट और फार्मेसी जैसे नॉन-टेक्निकल विषयों में भी AI लिटरेसी को जोड़ा जा रहा है। मिनिस्ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट एंड एंटरप्रेन्योरशिप के 'Skilling for AI Readiness' (SOAR) प्रोग्राम के तहत छात्रों को शुरुआती स्तर से ही जेनरेटिव AI टूल्स में माहिर बनाया जाएगा।
कॉरपोरेट जगत पर असर
बड़ी IT और सर्विस कंपनियों के लिए यह गेम-चेंजर हो सकता है। अगर यूनिवर्सिटीज इंडस्ट्री-रेडी टैलेंट तैयार करती हैं, तो कंपनियों का नए ग्रेजुएट्स को ट्रेन करने पर होने वाला मोटा खर्च कम होगा। साथ ही, यह एडटेक (EdTech) प्लेटफॉर्म्स और प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के लिए भी पार्टनरशिप के नए मौके खोल रहा है।
निवेश और रिस्क फैक्टर
हालांकि, इतनी तेजी से हो रहे विस्तार के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं:
- सुपरफिशियल ब्रांडिंग: संस्थानों द्वारा बिना इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारे सिर्फ कोर्स के नाम में 'AI' जोड़ने से डिग्री की वैल्यू गिर सकती है।
- फैकल्टी की कमी: टेक्नोलॉजी की रफ्तार एकेडमिक साइकिल से कहीं तेज है। इसे देखते हुए 2027 तक 10 लाख शिक्षकों को AI लिटरेसी की ट्रेनिंग देने का लक्ष्य रखा गया है।
- स्किल ऑब्सोलेन्स (Skill Obsolescence): AI टेक्नोलॉजी तेजी से बदल रही है, इसलिए कोर्सेज का जल्द पुराना हो जाना एक बड़ा खतरा है।
कुल मिलाकर, इन प्रोग्राम्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यूनिवर्सिटीज इंडस्ट्री के साथ कितनी सक्रियता से जुड़ी रहती हैं ताकि पढ़ाया जाने वाला कंटेंट हमेशा रियल-वर्ल्ड एप्लीकेशन्स के साथ अपडेट रहे।
